रविवार, 5 अगस्त 2012

मर्लिन मुनरो

मर्लिन की गाथा

मर्लिन  मुनरो  की मृत्यु के ६० साल पूरे होने पर...



ह अकथ कथा है, ऐसी उदास परी की, जो जिंदगी भर उस चीज के लिए पहचानी गई, जो उसे असह्य थी..
वो मोह लेने का मशहूर हुनर 

‘दि सेवेन इयर च’ में वो मशहूर ‘स्कर्ट ब्लो’ वैसे मर्लिन का मिजाज नहीं बताता, जिसकी बातें सबसे ज्यादा होती हैं.
कोई उसकी समंदरी नीली आंखों पर, कोई सुनहरी जुल्फों या रक्ताभ लिपिस्टिक रंगे होठों पर फिदा हो सकता है; और कोई संगमरमरी जिस्म या शोख अदाओं पर दुनिया न्यौछावर कर सकता है..

लेकिन, कौन देखता है कि सफलता के अंधेरे अनंत होते हैं. 9 साल में बलात्कार की यातना, दुकान की नौकरी पर बीता बचपन, 16 की उम्र में खुदकुशी की कोशिश..

बचपन की बदसूरती के चलते खूबसूरती के आग्रह का दु:ख उसके कितने भीतर तक धंसा था, इसका अंदाजा उसी के कथन से लगाइए..

‘‘मैं जब बच्ची थी, तब मुझसे किसी ने कभी नहीं कहा कि मैं सुंदर हूं. तमाम बच्चियों से कहा जाना चाहिए कि वे सुंदर हैं. वे सुंदर न हों तब भी.’’

उदास परी 
असहाय और सहायता के उसके सपने, जिसमें उसने देखा कि वह चर्च में जमीन पर लोट रहे जनसैलाब के सामने निर्वसना खड़ी है.. लोगों के सिर बचाने के लिए पंजों के बल चल रही है.
मर्लिन 1926 में जन्मी. उनकी मां मानसिक रोगी थीं. लिहाजा, ज्यादातर बचपन अनाथाश्रम अथवा दूसरों के घर में बीता.
36 साल की छोटी-सी जिंदगी और बड़ी कामयाबी. 1946 में उसे फिल्मों में काम मिल गया. एक साल के भीतर ही 30 बड़ी फिल्म उसके खाते में थीं.

मॉडलिंग से पहले पॉर्न फिल्म से शुरू हुआ सिलसिला उसे हॉलीवुड में सर्वोच्च शिखर तक ले गया.   वह वहां अकेली और भयभीत थी. सफलता के शिखर पर भी उसका जीवन उतना ही अवास्तविक था जितना एक स्वप्न..

उसे मेकअप, कैमरों और स्टूडियो से घृणा थी, पर उसके बिना वह जी भी नहीं पाती थी..

उसका असली ख्याल यह था..

मर्लिन की एक जानलेवा अदा 
‘‘सेक्स सिम्बल बनना एक वस्तु बन जाना है. मैं वस्तु होने से नफरत करती हूं. लेकिन, मैं सेक्स सिम्बल के बजाय किसी और चीज का सिम्बल बनना चाहती हूं. मैं यकीन करती हूँ कि मैं एक अभिनेत्री बनना चाहती हूं. अपनी इंटीग्रिटी के साथ एक अभिनेत्री . मैं सचमुच एक अदाकारा बनना चाहती हूँ, एक कामोत्तेजक जीव नहीं.’’

1949 में मर्लिन की फिल्म ‘जेंटलमेंस प्रिफर ब्लॉन्ड्स’ में जो गीत है, ‘डायमंड्स आर अ गल्र्स बेस्ट फ्रेंड्स’; वह उसकी जिंदगी पर खरा उतरता है. वह अपने लिए जिंदगी भर डायमंड्स इकट्ठे करती रही, ताकि पुरुषों के खोखले समाज में उसे इज्जत मिल जाए, पर वो उसे मिला नहीं.
इसलिए उसने कभी जो कहा था..
‘‘हॉलीवुड में किसी भी लड़की की प्रतिभा इस बात से आंकी जाती है कि वह कैसी दिख रही हैं, इस पर नहीं कि वह असल में हैं क्या. हॉलीवुड ऐसी जगह है, जहाँ आपको चुंबन के लिए हजार डॉलर्स मिल जाएंगे. लेकिन, आत्मा के लिए 50 सेंट्स भी नहीं. मैं यह जानती हूं और मैं महंगा ऑफर ठुकरा देती हूँ और 50 सेंट्स मंजूर कर लेती हूँ.’’


...पर प्रेम कहां था?

बेसबॉल स्टार जो डिमैगियो और नाटककार ऑर्थर मिलर से दुखांत और नाकाम विवाह उस दु:ख-गाथा का अध्याय हैं. समूची जिंदगी में वह सच्चे प्रेम के लिए तरसती रही और अंतत: नाकामी ने उसे मृत्यु-मार्ग सुझाया.
जिमी डोहर्टी से मर्लिन ने 16 की उम्र में पहली शादी की, जो बहुत नहीं चली. सफलता के दौरान 1954 में उनकी मुलाकात डिमैगियो से हुई. महज 9 महीनों में ये रिश्ता खत्म हो गया. मिलर ने उसके साथ 5 साल बिताए, पर प्रेम कहां था?

बस यही डायरी में उसने लिखा.. 


‘‘मैं अपनी शादी की वजह से दु:खी नहीं थी. लेकिन, इससे मैं खुश भी नहीं  थी. मैं और मेरे पति मुश्किल से ही एक-दूसरे से बोल पाते थे, और यह  सब इस वजह से नहीं था कि हम एक-दूसरे से नाराज थे. हमारे पास कहने को कुछ नहीं था. मैं इस ऊबाऊपन से मर रही थी. मेरी पैसों में कतई दिलचस्पी नहीं थी, मैं तो बस वंडरफुल होना चाहती थी. करियर वंडरफुल था. लेकिन एक ठंडी रात में उसे आप लपेट नहीं सकते थे. मैं कैलेंडर पर जिंदा रहूँगी, समय में कभी नहीं.’’

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो...
संभवत: उसे मृत्यु से प्यार था..


उसने कहा था..

‘‘मैं बिना फेस लिफ्ट कराए बूढ़ी होना चाहती हूँ. मैं चाहती हूँ कि मुझमें अपने उस चेहरे के प्रति भरोसेमंद रहने का साहस हो, जिसे मैंने बनाया है. कभी-कभी मुझे लगता है उम्रदराज होना टाला जा सकता है और जवान रहते मर जाएं तो बेहतर. लेकिन, तब आप अपनी जिंदगी पूरी नहीं करते. तब आप कभी भी अपने को पूरी तरह से नहीं जान पाएँगे.’’

कहते हैं कि 5 अगस्त 1962 में मर्लिन ने अपनी ही दवा से अपनी जान ले ली.. 5 अगस्त 1962 को लॉस एंजिल्स में अपने घर के शयनकक्ष में मर्लिन मृत मिलीं. घर की देखभाल करने वाली महिला ने तड़के डॉक्टरों को फोन करके बुलाया. दोनों डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. शयन कक्ष बंद होने के कारण उन्हें दरवाजा तोड कर कमरे में घुसना पड़ा. मर्लिन अपने पलंग पर निर्वसना पड़ी पाई गईं. नींद की गोलियों की शीशी उनकी बगल में मिली. अधिकारियों ने बाद में कहा, ‘‘शायद मर्लिन ने आत्महत्या की.’’ लेकिन,अब तक खुदकुशी की थ्योरी पर लोगों को संदेह है..

शायद वह इस बार भी संभवत: प्रेम में नाकाम हो गई थी..


राष्ट्रपति कैनेडी के साथ मर्लिन 
कयास ही है, पर अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी और उसके बीच प्रेम का अंकुर फूट चुका था.. उसने अपना आखिरी फोन कैनेडी को ही किया था.. यह एक रहस्य रहा, जिसकी तस्दीक कभी नहीं हो पाई.. उसकी जिंदगी के अंत के रहस्यों के कई किस्से हैं, पर मर्लिन को न समझ पाना ही इसका अंत है.


मधुबाला जैसी..

पता नहीं क्यों मर्लिन और मधुबाला की तुलना को जी चाहता है...
 मधुबाला : जीवन में मधु 

धरती पर सौंदर्य की देवी ‘वीनस’ के दोनों अवतारों में महज नाम के हिज्जों के आरंभाक्षर का साम्य न था.

दोनों एक ही कालखंड की पैदाइश थीं. 

एक पश्चिम और दूसरी पूरब में. 

दोनों के फिल्मी नाम मूल नाम से बदले हुए. एक का नोरमा जीन्स मॉरटेंसन. दूसरी का मुमताज से मधुबाला.

दोनों ने कम उम्र में काम शुरू किया और अपार सफलता और ख्याति पाई.



दोनों की उम्र 36 साल.

दोनों जीवन भर प्रेम ढूंढती रहीं...


दोनों की मौत रहस्य का पिटारा है..

रविवार, 10 अप्रैल 2011

वलनी में किसानों का कायाकल्प कर दिया तालाब ने

बरास्ता गाँधी, जीवन बदलता एक पानीदार गाँव



इस बार वलनी के ग्राम तालाब की पार पर खड़ा हुआ तो दिल भर आया. हरे, मटमैले पानी पर हवा लहरें बनाती और इस किनारे से उस किनारे तक ले जाती. लगता दिल में भी हिलोरें उठ रही हैं. कहाँ था ऐसा तालाब ? जो था, वो सपनो में ही था. सपने अगर सच हो जाएं तो दुनिया, दुनिया ना रह जाए. मगर आँखें तो सच देख रही थीं. कितने साल, मई की भरी दुपहरी में, जब भीतर तक जला देने वाली लू और देह से सारा जल निचोड़ लेने वाला सूरज धरती के सीने में भी बिबाई बो देता, तब उस सूखे तलहट में चहलकदमी करते हुए सोचा करते कि यहाँ से वहां तक, इधर से उधर तक, भर जाये पूरा तालाब पानी से. आमीन ! तथास्तु !! 

अब तो मुग्ध आँखें नज़ारा देख रही हैं और कान सुन रहे हैं. पार्श्व से फूटती गूंजती आवाज़ में जैसे भविष्यवाणी हो रही है : "इस बार जितना भरा है, उतना तो कई दशकों में नहीं भरा. अब नहीं सूखेगा ये. इसमें दो पुरुष से ज्यादा पानी है." 

पिछले ११ सालों में कितनी ही बार, इस १९ एकड़ के तालाब को पैदल चलते हुए पार करते हुए दिमाग में बेवजह हिंसक तस्वीरें बनने लगतीं, जैसे गाँववालों के दिल से रिसते खून से ही भरेगा ये तालाब. ऐसे-वैसे मिला लो तो कोई २३ सालों का है ये संघर्ष. लेकिन, कोई कह दे कि बूँद भर खून भी माटी में गिरा हो.   फिर केशव  डम्भारे  और योगेश अनेजा के चेहरे उभर आते और खिलखिलाती, मजबूत आवाज आती; ''हम तो ऐसे ही लड़ेंगे. एक कतरा भी खून नहीं गिरेगा. सिर्फ पानी से भरेगा तालाब.'' अचानक चौरी-चौरा  की याद हो आई. गाँधी ने अहिंसा के व्रत के लिये कितना बड़ा त्याग किया था! सबके विरोध के बावजूद पूरा आन्दोलन रोक दिया. महात्मा के संकल्प  को असली मायनों में ये लोग अपनी लड़ाई के मार्फ़त आगे बढ़ा रहे हैं.  सचमुच, अनवरत संघर्ष से निकले पसीने और पानी ने ही यहाँ की धरती को सींचा है और उससे जो बेलें फूटी हैं, वे दुनिया को राह दिखने वाली हैं. 

चलिए पहले वलनी का किस्सा सुनते हैं, और फिर हासिल की बात करते हैं. 

ये समाज और सत्ता, जनता और जनार्दन, गण और तंत्र के बीच जारी अनवरत द्वंद्व की कथा है. विषयवस्तु बस इतनी-सी है कि एक गाँव है; गाँव का एक निस्तारी तालाब है और मालगुजार/ जमींदार है. जमींदार तालाब हड़प लेता है और गाँव वाले उसे छुड़ाने के लिये अथक आन्दोलन करते हैं. सारी व्यवस्था, सत्ता और राजनीतिक तंत्र, न्याय प्रणाली जमींदार के पक्ष में अंगद के अंदाज़ में खड़ी है. जनता का मोर्चा भी लगा है. तालाब को ग्राम समाज ने अपने कब्जे में ले लिया है. अंततः उपसंहार का इंतजार है. लेकिन, इस तालाब और उसकी लड़ाई ने वलनी के जीवन को बदल दिया है, जीवन स्तर को आर्थिक और सामाजिक तौर पर सतह से बहुत ऊपर उठा दिया है. तालाब खुद भी तब्दील हो गया है, जीवनधारा में. उसने किसानों को जीने के नए मायने सिखाये हैं. अपनी जमीन और खेत से फिर से प्यार करना सिखाया है. 

वलनी नागपुर से महज २१ किलोमीटर दूर है और वहां ये सब कुछ घट रहा है. ये हुआ कैसे और आखिर हुआ क्या?, जानने के लिये अतीत के झरोखों से तीन दशक पीछे झांकना पड़ेगा. 

सन १९८३ की बात है. नौसेना से नौकरी छोड़कर एक नवयुवक अपने गाँव लौट आया. यानी केशव रामचंद्र डम्भारे. पिता रामचंद्र गाँव के सरपंच थे और किसान भी.  लेकिन केशव को खेती नहीं करनी थी. उनके मन में एक दूसरा है ख्याल था. सहकारी समिति से लोन लेकर उसने चार भैंसें खरीदीं और डेयरी फार्म खोला. दूध की सप्लाई नागपुर होती. सालभर के भीतर चार से दस भैंसें हो गईं. आमदनी काफी बढ़ गई. लेकिन, एक समस्या बरक़रार थी. गाँव में पानी नहीं था. ग्राम-तालाब मार्च खत्म होते-होते सूख जाता. फिर शुरू होती असली कसरत. केशव और उनका कर्मचारी रोजाना खेत के कुएं से प्रति भैंस आठ बाल्टी पानी खींचते. यह काम उन्हें इतना थका देता कि शेष कुछ नहीं हो पाता. बच्चों को भीषण गर्मी से  निजात दिलाने के लिये वे कूलर खरीद लाये, पार उसमें पानी डालने के लिये रात १२ बजे तक का इंतजार करना पड़ता. इसके पहले तक गाँव के एकमात्र हैण्डपम्प पार महिलाओं का कब्ज़ा रहता, जो अपने घरों के लिये लड़ते-झगड़ते पीने का पानी भरतीं. नतीजा ये हुआ कि पानी के अभाव के मारे केशव ने डेयरी फार्म बंद करने का फैसला किया. इसके बावजूद उनके दिमाग को एक सवाल मथता रहता. गाँव में इतना बड़ा तालाब है, बारिश भी अच्छी होती है. इसके बावजूद पानी की इतनी किल्लत क्यों?  नतीजे पर पहुंचे कि तालाब में गाद जमा हो गई है और जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया)  से पानी तालाब में बहकर नहीं आता है. अधसूखे तालाब में मार्च तक थोड़ा-बहुत पानी रहता है और फिर जून तक सूखा. बारिश आई तो भरा, वर्ना ढोर-डंगरों का काम किसी तरह चलाना पड़ता. गाद कोई निकलता नहीं. हर साल मिर्च, बैंगन, टमाटर, सेम, कद्दू लगाना हो बुजुर्गों के कहने पर तलछट से दो-चार छिटुए मिट्टी भर लाये और बीज बो दिए. अंकुर फूटे तो खेत में लगा दिए. 

तालाब को गहरा करने के लिये यह काफी नहीं था. हद तो तब हो गई, जब अचानक दो भाई भगवान और श्रावण नान्हे आए और तालाब में मछलियाँ पालने लगे. पता लगाया तो मालूम हुआ कि गाँव तालाब का पॉँच एकड़ हिस्सा जमींदार/ मालगुजार रुद्रप्रताप सिंह पवार ने बेच दिया है. सवाल उठा: तालाब तो गाँव का था, जमींदार ने कैसे बेच दिया? तहसीलदार से शिकायत की तो नान्हे बंधुओं और जमींदार पवार का कब्जे की पुष्टि हो गई. यही नहीं, शेष १४ में से पॉँच एकड़ सीलिंग में चला गया. गाँव में हड़कंप. केशव ने दस्तावेज निकलवाए तो पता चला अंग्रेज सरकार के बंदोबस्त के मुताबिक १९११-१२ में तालाब को जमींदार से सरकारी कब्जे में ले लिया गया था. लेकिन बाद में किसी तरह जमींदार ने उसे अपने नाम चढवा लिया. गाँव वाले इसके खिलाफ एक हो गए. तहसीलदार   से लेकर कलेक्टर, ग्राम पंचायत से लेकर जिला परिषद तक, शिकायत की. कोई नतीजा नहीं निकला. साल दर साल निकलते गए. फिर आया वर्ष १९९७. इस गाँव में योगेश अनेजा अपने दोस्त योगेश वानखेड़े के साथ पहुंचे. केशव और उनके साथियों ने उनका स्वागत किया और तालाब की बात निकली. योगेश ने सलाह दी कि तालाब किसी का भी हो पहले उसे खोद लिया जाये. गाँव वाले श्रमदान करें. शुरुआत हुई, पर बात नहीं बनी. हाथ से तालाब खोदना संभव नहीं था और गाँव में किसी के पास 'बेगार' के लिये समय भी नहीं था. तब गाँव में अलख जगाने के लिये केशव और योगेश के दस्ते ने वृक्षारोपण शुरू किया. धीरे-धीरे एक बात और समझ में आई कि बरसात का पानी गाँव में रुकता नहीं है, इसलिए खेतों में ही जलसंग्रह जरूरी है. सड़क बन रही थी तो ठेकेदार गाँव के गौण खनिज यानी मुरुम लूट रहा था. योगेश और केशव के दस्ते ने उसे रोका और राज़ी किया कि वे जहाँ से कहें, वहां से मुरुम निकली जाये. ठेकेदार मान गया और गाँव में पहली बार एक पोखर (छोटा तालाब) बन गया. पानी जमा हुआ तो कुओं का जलस्तर बढ़ गया. गाँव के किसानों का विश्वास इस हरावल दस्ते पर जमने लगा. ग्राम पंचायत के कोष से लोग शेततली (खेत तालाब) बन्ने के लिये राजी होने लगे. पानी रुकने लगा तो कुएं भरने लगे. सिंचाई ज्यादा होने लगी. लेकिन ग्राम-तालाब की हालत अब भी खराब थी. योगेश ने केशव के सहयोग से आमराय बनवाई कि जेसीबी मशीन से तालाब खोदा जाये. लेकिन, उसकी मिट्टी का क्या हो? बुजुर्गों का अनुभव और परंपरागत ज्ञान काम आया. तय हुआ कि हर खेत में एक टिप्पर मिट्टी डालने के २०० रुपये देने होंगे. नुकसान होने की सूरत में भरपाई की जिम्मेदारी भी ली. पहले ही दिन एक लाख चार हज़ार रुपये इकट्ठे हो गए. नतीजा अच्छा रहा. तालाब खुदने लगा और जिन खेतों में ये मिट्टी डली, उसमें फसल भी कई गुना हो गई. आसपास के गांवों से भी आर्डर आने लगे तो गाँव के  किसानों की हिम्मत भी बढ़ी और साल दर साल काम चलता गया. कई बाधाएं आईं. मालगुजार ने लठैतों, अपराधियों, पुलिस, प्रशासन, नेताओं, अदालत; सबकी मदद ली और पूरा जोर लगा दिया कि तालाब उसके हाथ लग जाये. नान्हे बंधुओं ने भी काफी बाधाएं डालीं. चुनावी राजीनति के चलते गाँव में बने दो गुट से भी काम प्रभावित हुआ. लेकिन, केशव के नेतृत्व और योगेश के मार्गदर्शन में गाँववाले अडिग रहे. ट्रैक्टर के सामने बिना डरे लेटे, लाठियां खाईं, अनशन किया, दौड़-भाग की, कागज-फाइलें फिरवाईं, महीनों कलेक्टर और अफसरों के दफ्तर के सामने बैठे, जेल गए. लेकिन, हारे नहीं. १५ साल से हर रोज़ किसी ना किसी मुसीबत से लड़ते-लड़ते आदत सी हो गई है. यह तब तक चलेगा, जब तक कि तालाब गाँव का ना हो जाये. एक अच्छा काम हुआ. केशव और उनके साथियों की संख्या बढाती चली गई. अब हाल यह है कि पूरा गाँव एक है. राजनीतिक विरोधी भी साथ मिलकर ये काम कर रहे हैं. इस संघर्ष ने केशव और योगेश को सिखाया कि हर बार गाँव की तरक्की का  नया आइडिया खोजा जाये और उसे अमल में लाया जाए. पिछले साल यह हुआ कि पंचायत की मर्ज़ी के मुताबिक सड़क बनने वाले ठेकेदार ने मुरुम निकलने के लिये आधे से कुछ काम तालाब को १५ फुल गहरा खोद दिया. लेकिन, अब उसमें पानी भरने का संकट था, क्योंकि जलग्रहण क्षेत्र उसे पूरा नहीं कर पाता. यहाँ गाँव वालों की देशज समझ काम आई. उन्होंने ठेकेदार से गाँव के बाहर से तालाब तक एक छोटी नहर बनवा ली. बरसात में इस नहर से होता हुआ इतना पानी इस तालाब में आया कि वह पूरा भर गया और अब शायद ही कभी खाली हो. दूसरा हिस्से की खुदाई के लिये पानी निकलने के वास्ते पम्प लगाना पड़ रहा है. दूर तक के कुएं भर गए हैं. नान्हे भी खुश है. उसका गाँव वालों से समझौता हो गया है. वह पूरे तालाब में मछलियाँ पालता है और लाखों की मछलियों के बदले सालाना सात हज़ार रुपये ग्राम पंचायत को देता है. यानी आम के आम, गुठलियों के दाम. इस एक  तालाब ने गाँव का जीवन बदल दिया है. जरा आश्चर्य हो सकता है, पर योगेश कहते हैं : कोई लूट सके तो लूट ले हमारे गाँव की मिट्टी और मुरम को. 

वर्षों के सत्याग्रह का नतीजा वलनी फार्मूले के तौर पर निकला है.  अब यह बहुवचन हो गया है यानी 'फार्मूलों'.

१. पहला फार्मूला था कि तालाब को खोदो और उसकी गाद खेत में डालो. इससे फसल कई गुना बढ़ जाएगी. वलनी और आसपास के किसानों ने इस फार्मूले को अपनाया और बकौल योगेश, वे अब अपने उन खेतों से प्यार करते हैं, जिन्हें वे कभी पैदावार ना होने की वजह से बेचना चाहते थे.  फसल दोगुनी होने से आमदनी बढ़ गई है. उनका जीवन स्तर सुधर गया है. गाँव में १०० से ज्यादा पक्के मकान बन गए हैं. गाँव का हर बच्चा स्कूल जाता है. शराब और क़र्ज़ की लत अपने आप काम हो गई है. महिलाओं की पिटाई लगभग बंद हो गई है. तालाब खोदने से 
२. दूसरा फार्मूला पूरे गाँव और खेतों में खेत-तालाब बना दिए जाएं. गाँव में अब छोटे-बड़े २४ तालाब हैं. योगेश और केशव इसे 'ऑपरेशन तालाब' कहते हैं. इन तालाबों ने खेतों को पानीदार और उपजाऊ बना दिया. अब यहाँ गर्मियों की छोटी-मोती फसलें और सब्जियों की खेती भी होने लगी. उनका लक्ष्य फ़िलहाल १०० तालाबों का है. 
३. तीसरा फार्मूला बरसात में गाँव से बह जाने वाले पानी को रोकने और संग्रह करने का है. वलनी गाँव की कुल जमीन का १०-१५ फ़ीसदी हिस्सा ऐसा था, जो बरसात के दौरान नालों में तब्दील हो जाता था. ये नाले जमीन को बंजर बना देते थे और जमीन के मालिक किसान परेशान थे. इन नालों के रास्तों की पहचान करके अब कुछ माध्यम आकर के तालाब बना दिए गए है. इससे पानी अब यहाँ जमा हो जाता है और वह जमीन काम में आने लगी. इससे किसानों को दोहरा फायदा हुआ. 
४. चौथा फार्मूला गाँव के गौण खनिज का अपनी मर्जी से दोहन का है. योगेश बताते हैं कि पहले ठेकेदार ३० ट्रिप की रॉयल्टी देकर ३०० ट्रिप मुरुम निकालता था. वह भी अपनी मर्जी से. इससे गाँव में कहीं भी बड़ा गड्ढा हो जाता था और कोई काम भी नहीं आता था. हमने उसे रोका और कहा हमारी मरजी से मुरुम निकाले. यह तरकीब काम आई और वलनी में कई तालाब इसके भरोसे बन गए. योगेश को उम्मीद है कि ये फार्मूला अगर हर गाँव में अपना लिया जाए और कलेक्टर इस पर ध्यान दे तो तालाब खुदवाने पर अलग से खर्च करने की जरूरत नहीं है. पेयजल और निस्तार, दोनों इसी से निपट जाएं. 
५. पांचवां फार्मूला बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने का है. गाँव में ऐसे कई खेत हैं, जो बंजर पड़े हैं. उन्हें उपजाऊ बनाने के लिये किसानों के पास पैसे नहीं हैं. हाल ही में वलनी में केशव और योगेश ने ये प्रयोग किया. एक बंजर जमीन पर तालाब की मिट्टी डलवाई और उस हिस्से में मंडवा लगाकर करेला, चौलाई, सेम, कद्दू, लौकी, तुरई जैसी बेलवर्गीय फसल लगाईं. नतीजा, चौंकाने वाला था. इतनी फसल हुई कि आसानी से कोई किसान लगत और मुनाफा निकल ले. छोटे और भूमिहीन किसानों को ये प्रयोग पसंद आये और वे इन्हें बड़े पैमाने पर करने की तैयारी कर रहे हैं. 
६. छठा फार्मूला श्रमदान का है, जो गाँव में परिवर्तन ले आया है. हर सप्ताह गाँव के कुछ लोग, बच्चे, बूढ़े और जवान चार घंटे ग्राम सफाई करते हैं. स्कूल के छात्र और अध्यापक भी. इससे गाँव में घर के आसपास ही कूड़ा फ़ैलाने की प्रवत्ति पर रोक लगने लगी है. खासकर प्लास्टिक पन्नी से होने वाला कचरा काम हो गया है.
७. सातवाँ फार्मूला टिकोमा गौड़ी चौड़ी के बारहमासी फूलदार पौधे लगाने का है, ताकि गाँव सुन्दर दिखे. वलनी ने सफलतापूर्वक इस काम को पूरा किया है और इसके लिये बेकार पड़ी चीजों से कठघरा भी तैयार किया है, ताकि पशु उसे खा ना जाएं. 
८. आठवां फार्मूला ग्राम में हर घर में शौचालय का है. यह इस गाँव का अद्भुत प्रयोग था और श्रमदान से चलते अब यहाँ ९९ फ़ीसदी घरों में शौचालय हैं. इसके लिये गाँव को राष्ट्रपति से निर्मल ग्राम पुरस्कार भी मिला. 
९. नौवां फार्मूला हर घर में पेयजल के लिये नल का था. पंचायत ने इसके लिये टंकी बनाई और फिल्टर, शुद्ध जल सप्लाई किया जाता है. इससे लोगों के स्वास्थ्य में सुधार तो आया ही, पानी के लिये आपसी झगड़े भी बंद हो गए. 
१०. दसवां फार्मूला पीढ़ी दर पीढ़ी इस गहरे ज्ञान को बनाये रखने के लिये दी जाने वाली सीख है, ताकि भविष्य में भी ये सब चलता रहे. 

योगेश अनेजा इस फार्मूले को कहते हैं : १-१००-१०००-१००००.

उनकी परिभाषा में एक का मतलब हर सप्ताह एक घंटे का श्रमदान. सौ का मतलब १०० छोटे-बड़े तालाब. १००० का अर्थ एक हज़ार टिकोमा गौड़ी-चौड़ी के पेड़ लगाना, ताकि तितली, भौंरे, मधुमक्खी समेत मनुष्य-मित्र कीट बचे रहे. १०००० के मायने १०००० बेलवर्गीय खेती के मंडवे पूरे गाँव में तैयार करना, ताकि कोई भूखा ना रहे. वे कहते हैं देश के पॉँच लाख गाँव के बीच वलनी एक दारोगा की तरह खड़ा है कि पानी की लूट रोकी जा सके.

वलनी गाँव की कथा के ये कुछ अध्याय हैं. पूरी महागाथा सुनने और गुनने के लिये आपको आना होगा इस गाँव तक. ग्राम तालाब की लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है. तहसीलदार और कलेक्टर ने हाथ खड़े कर दिए हैं. कहते हैं सरकारी जमीन पर पंचायत को कब्ज़ा दिलाने के लिये बड़ी अदालत में मुक़दमा लड़ना पड़ेगा. सत्य के आग्रही इसे नहीं मानते. वे कहते हैं : शायद, जमींदार का दिल बदल जाए और वह अपना अवैध कब्ज़ा छोड़ दे. इन दिनों वे तालाब की पार तैयार करने में जुटे हैं. 




ये दो साल पहले के फोटो हैं. उसके बाद से और कई तब्दीलियाँ हुई हैं. 






































एक माह में बन गए १२० शौचालय 

किसी भी गाँव की साफ-सफाई में शौचालय का होना बेहद महत्त्वपूर्ण है. अगर गाँव वाले खुले में शौच करें तो गन्दगी घर, शरीर और दिमाग में कब्ज़ा कर लेती है. वलनी तो आदर्श गाँव योजना में शामिल गाँव था. लेकिन, उसकी हालत भी दूसरे गाँव की तरह थी. लोग खुले में शौच करते. हमेशा बदबू आना गाँव का अभिशाप था. लेकिन, क्या हो सकता था? सब चाहते थे कि घर में ही शौचालय हो, पार सबसे बड़ी समस्या थी पानी का अभाव. एक बार शौचालय जाने में दो बाल्टी पानी खर्च होता. गाँव का एकमात्र हैण्डपम्प सैकड़ों बार चलने पर एक बाल्टी पानी देता. ये सबके बूते के बाहर था. तालाब के काम के लिये योगेश और केशव एक दिन बीडीओ के पास गए तो उन्होंने बताया कि निर्मल ग्राम पुरस्कार मिलने वाला है. एक लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन, यहाँ के किसी गाँव को नहीं मिल सकता क्योंकि किसी भी गाँव में १०० फीसदी शौचालय नहीं हैं. योगेश और केशव ने कहा, हमारे गाँव को मिल सकता है. बीडीओ चकित. बोले-नहीं मिल सकता, क्योंकि ९८ फ़ीसदी घरों में शौचालय नहीं हैं. योगेश-केशव ने कहा-बन जाएंगे. बीडीओ ने कहा-अगर ऐसा हो जाए तो क्या बात है. मैं अपनी जेब से ५००० रुपये दूंगा. योगेश-केशव गाँव लौट आये. गाँव वालों के साथ बैठक की. गांववालों ने कहा-नहीं हो सकता. सब हो जाए, पर मिस्त्री कहाँ है? बाकी का पैसा कहाँ से आएगा. योगेश ने अपनी जेब से २०००० रुपये देने का वादा किया तो तब तक उप सरपंच बन चुके केशव ने पंचायत से ईंट, रेत, सीमेंट देने की बात पक्की कर दी. हर शौचालय पर सरकारी हिसाब से ४०० रुपये अनुदान भी मिलना था. हर शौचालय बनाने पर कुल खर्च ४००० रुपये आना था. यानी तकरीबन १५०० रुपये हर घर के मालिक को लगाने थे. वे तैयार हो गए. अब सवाल मिस्त्री का था. योगेश ने इस समस्या का हल भी निकल लिया. कहा- वे नागपुर से मिस्त्री लाएंगे, पर ५ बाई ५ बाई ५ का गड्ढा खुद खोदना होगा और मिस्त्री के साथ कुली का काम करवाना होगा. सब तैयार हो गए. फिर क्या था-रोज़ सुबह नागपुर के गिट्टीखदान चौराहे से योगेश अपनी मारुति-८०० कर में ५ मिस्त्री लादकर गाँव तक लाते और गाँव के दो मिस्त्री. सात मिस्त्री रोज़ गाँव में हर दिन सात शौचालय तैयार कर देते. महीना बीतते-बीतते १२० शौचालय तैयार हो गए. बीडीओ और अन्य अफसर आए तो अचरज से भर गए. लेकिन, योगेश और केशव निर्मल ग्राम पुरस्कार लेने नहीं गए. उस सरपंच को भेजा, जो राजनीतिक रंजिश में सारे कामों में पलीता लगाए हुए था. वह लौटा तो इस टीम  का फैन बन गया. वह दिन था और आज का दिन है, गाँव में कोई गुट नहीं बचा. हाल ही में आदर्श गाँव समिति की बैठक में इस उपलब्धि पर इतनी तालियाँ बजीं कि बहुप्रशंसित करोड़पति गाँव हिवरे बाज़ार के करता-धर्ता पोपटराव पवार भी शरमा गए. उनके गाँव में तीन माह में तीन शौचालय ही बन पाए हैं. बस केशव डम्भारे  को एक ही दुःख है कि दो घर अब भी छूट गए हैं. 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है....


हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है....

साक्षात्कार : केशव डम्भारे


केशव डम्भारे अभी ५४-५५ के हैं. २४ साल पहले जब नौसेना की नौकरी छोड़कर वे आपने गाँव पहुंचे तो पानी की विकराल समस्या से उनका आमना-सामना हुआ. तबसे वे लगातार अपने साथियों के साथ मिलाकर ग्राम-जल के पुनर्जीवन के लिये लड़ रहे हैं. वे विज्ञान में किसी कारण डिग्री पूरी नहीं कर पाए, पर ग्रामजीवन का विज्ञान उन्हें खूब आता है. उन्हें मालूम है कि किस रसायन में किस तत्त्व के मिलन से ऊर्जा निकलेगी और किस तत्त्व को मिलाने से विस्फोट होगा. वे फ़िलहाल वलनी गाँव के उपसरपंच हैं और राजनितिक-समाजकर्म ही उनकी जिंदगी का प्रमुख उद्देश्य है. राजनीति के सारे पैंतरे और दांव-पेंच उन्हें पता हैं, पर वे सार्वजानिक जीवन की शुचिता में विश्वास रखते हैं. जनता के जागरण पर उन्हें अगाध भरोसा है और यही कारण है कि वे गाँधी, विनोबा के रास्तों पर चलना चाहते हैं. उनके सब्र ने उनके राजनीतिक विरोधियों को भी उनका मित्र बना दिया और यह थाती उन्हें उनके पिता दिवंगत रामचन्द्रजी गणपतराव डम्भारे से मिली. उनके पिता कई सालों तक निर्विरोध गाँव के सरपंच थे. अब वे अपने राजनीतिक विरोधियों को भी निर्विरोध चुनवाने का माद्दा रखते हैं. वलनी में ग्राम तालाब का पुनर्जीवन और उसे ग्राम सम्पदा बनाना उनका लक्ष्य है. योगेश अनेजा और केशव डम्भारे एक गाड़ी के दो पहिये हैं, जो नए-नए प्रयोगों में दिलचस्पी रखते हैं. उनके प्रयोगों से ही गाँव इस मुकाम तक पहुँच गया है. उनसे सीधी बात करके इसे समझा जा सकेगा :

- आखिर ऐसा क्या हुआ कि गाँव लौट आए? 
-अपना गाँव सबसे अच्छा हो, हमेशा से मेरा सपना था. नौसेना छोड़कर यहाँ पहुंचा तो असलियत सामने आई कि हम कितने पिछड़े हैं. यहाँ पानी की भरी किल्लत थी. पशुओं के लिए चारा नहीं था. खेत सूखे थे और पैदावार अच्छी नहीं थी. लागत से आमदनी हमेशा कम थी. सीधे कारण थे - सिंचाई सुविधा का ना होना, मिट्टी की उर्वरता का नष्ट होना और उसे बढ़ाये जाने के प्रयास ना किये जाना आदि. मैंने इस मामले में जनजागरण करने का प्रयास किया और पहला काम तालाब को फिर से संवारना था. 

-मालगुजार इतना प्रभावी है और व्यवस्था भी आपके खिलाफ है, लेकिन आपकी इतनी लम्बी लड़ाई कभी टूटी नहीं?
-हम सत्याग्रही थे. हम कोई गलत काम नहीं कर रहे थे. हम आन्दोलन ऐसे करते थे कि मन, विचार और शरीर से कभी हिंसा ना हो. इसलिए हमारी ओर से उनको कभी मौका नहीं मिला. फिर भी हम सात लोगों को दलित प्रताड़ना कानून के झूठे मुक़दमे में फंसाया तो हम सच्चाई के कारण अंततः छूट गए. 

-तालाब की मिट्टी खेत में डालने का ख्याल कैसे आया?
-ये पुराना तरीका था. बड़े-बूढ़े बताते थे कि बेल वाली सब्जी लगनी हो तो तालाब की मिट्टी ले आओ. हर किसान साल में एक बार दो-चार बैलगाड़ी मिट्टी अपने खेत में डालता और टमाटर, मिर्ची, सेम, कद्दू, लौकी बो देता. पौधे आते तो उसे खेत में लगा देता. लेकिन जिस हिस्से में ये मिट्टी पड़ती, वहां होने वाला अन्न काफी स्वादिष्ट और अच्छा होता था. यहीं से ये ख्याल आया कि पूरे खेत में मिट्टी दल दी जाएगी तो पूरी फसल अच्छी हो जाएगी. ये बात सच साबित हुई. पैदावार बढ़ गई. फिर पानी बढ़ा तो इसमें और इजाफा हो गया. 

-आपने गाँव में क्या बदलते देखा?
-लोगों का जीवन स्तर सुधर गया. आमदनी अच्छी हो गई तो रहन-सहन, खाना-पीना, पढाई-लिखाई, सब चीजों का स्तर बढ़ गया. धड़धड़ पक्के घर बन गए.

-सिर्फ आर्थिक विकास हुआ या सामाजिक भी?
-हर स्तर पर प्रगति दिखती है. गाँव की शराब की दुकानें बंद हो गईं. लोगों का शराब पीना कम हो गया. महिलाओं के साथ मारपीट बंद हो गई. बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने लगे. लड़कियां पढ़ने लगीं. हर बच्ची स्कूल जाती है. लोगों में वैमनस्य कम हुआ है. यहाँ तक कि १२-१३ भूमि हीन परिवारों का जीवन स्तर भी बढ़ा है. उनमें से कुछ ने जमीन भी खरीद ली है. लोग अब खेत बेचने की बात नहीं करते. अब वे कहते हैं, हम अच्छे और हमारे खेत अच्छे. खेती के प्रति ये जो प्रेम बढ़ा है, वो सामाजिक तरक्की का द्योतक है. 

-कुछ कमी रह गई? 
-हाँ. अभी भी तालाब हासिल करना बाकी है. हम नागपुर जिले के एकमात्र आदर्श गाँव हैं, पर यहाँ अब भी दो घरों में संडास (शौचालय) नहीं हैं. वे खुले में दिशा मैदान जाते हैं. लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन की हवा चल रही है. वो गति पकड़ेगी तो देश बदल जायेगा. हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है.


-सुनील सोनी 

ये ना थी हमारी किस्मत कि विसाल ए यार होता..

ये न थी हमारी किस्मत...  

फिल्म विश्लेषण : सात खून माफ़


निर्देशक/ संगीतकार : विशाल भारद्वाज


निश्चय ही 'सात खून माफ़' एक ऐसी फिल्म है, जो आपको राहत देती है कि आप अकेले ही नहीं हैं, जो जिंदगी में चाही-अनचाही घुसपैठों को भुगत रहे हैं. आपकी जिन्दगी में दाखिल लोग, जिनके मुखौटे उतरने  पर दुनिया के तमाम असौंदर्य और अधैर्य का अहसास होता है, सारी चीजों को बंजर बना चुके होते हैं. तब आप एक फैसला लेते हैं, उन्हें जिन्दगी  और दुनिया से खारिज करने का. अधीरता में ही सही, निर्णय का यही चरम संभवतः जीवन की दुश्वारियों के बीच से पगडंडियाँ  बनाता है. रस्किन बांड की लघुकथा  'सुजेना'ज सेवेन हसबैंड' पर आधारित इस फिल्म में विशाल भारद्वाज ने  बड़ी सफाई से पुरुष प्रधान समाज की बखिया उधेड़ी है. पहली नज़र में सुजेना का चरित्र आपको 'निम्फो-मेनियक'  दिखाई पड़ सकता है, पर ऐसा है नहीं. असली प्यार की तलाश सुजेना को कहाँ नहीं ले जाती, पर हर बार पैकिंग के चमकदार रैपर उतरते ही बदसूरती अपनी सारी भयावहता और सड़ांध के साथ ऐन मुंह के सामने आ खड़ी होती है. वास्तव में ये सुजेना और उसके रिश्तों की पड़ताल नहीं है; ये समाज के बहुस्तरीय अस्तरों में छिपे सच की खुरचन है.

यह एक खूबसूरत एंग्लो-इंडियन युवती सुजेना ऐना मेरी जोहानिस उर्फ़ साहेब की कथा है. फिल्म में यह किरदार प्रियंका चोपड़ा ने निभाया है. बचपन में है माँ के साए से महरूम हो गई सुजेना फिर से वही स्नेह पाना चाहती है. सच्चा प्रेम पाने के लिये एक के बाद एक, सात शादियाँ करती है, पर प्यार की जगह धोखा खाती है. छह पतियों का  क़त्ल  करती है और सातवाँ खून खुद अपनी शिनाख्त मिटाकर करती है. फिल्म में फोरेंसिक डॉक्टर अरुण (विवान शाह)  अपनी पत्नी नंदनी (कंकणा सेन शर्मा)  सुजेना की कथा कहता है, जो उसे देखते और चाहते हुए बड़ा हुआ है. सुजेना का पहला पति एडविन रोड्रिक्स (नील नितिन मुकेश) सेना का एक लंगड़ा मेजर है, जो बेहद क्रूर है और बीवी को सिर्फ भोग्य और संपत्ति समझता है. सुजेना के स्वाभिमान को चोट पहुंचाकर तृप्ति पाने वाले मेजर को सुजेना आदमखोर शेर का निवाला बनवा देती है. फिर उसकी जिंदगी में जमशेद सिंह राठोड़ (जॉन अब्राहम) आता है, जिसे सिर्फ उसके पैसे से मतलब है. ड्रग्स, लड़कियां, संगीत चोरी से निपटते निपटते सुजेना उसे अंततः हेरोइन ओवरडोज से मुक्ति दिलवा देती है. तीसरा शौहर वसीउल्लाह खान (इरफ़ान)  अच्छा शायर है, पर बिस्तर पर बेरहम जल्लाद. उसे जीते-जी कब्र नसीब होती है. चौथा शौहर रूसी जासूस निकोलाई वेरोंसकी (अलेक्जेंद्र दायचेंको) दोहरी जिंदगी जी रहा है. सुजेना इस छल को नहीं बख्शती. पांचवां पति कीमतीलाल (अन्नू कपूर ) उसके जिस्म का दीवाना है और कुछ जरा जल्दी ही वियाग्रा का ओवरडोज खाकर मरता है. छठा हसबैंड डॉ. मधुसूदन तरफदार (नसीरूदीन शाह ) उसकी संपत्ति हड़पने का भेद खुलने पर मारा जाता है. इन पूरे चक्करों में सुजेना ना केवल यह समझ गई है कि खूबसूरत जिस्म का इस्तेमाल कैसे किया जाये, पर यह भूल भी गई है कि सिर्फ जिस्म ही मंजिल नहीं है. इसलिए वह जब नौजवान हो चुके अरुण को पाना चाहती है, तो वह इंकार कर देता है. उसका दिल फिर एकबार टूटता है, पर उसे परिणति पर पहुँचने का सबक भी देता है. पूरी फिल्म का दूसरा भाग ही ज्यादा तेज घटनाक्रमों से भरा है, जहाँ फ्लैशबैक और वर्तमान एक जगह आकर मिलते भी हैं. खुद रस्किन बांड का एक किरदार में होना अच्छा महसूस करता है. यह फिल्म आपको सुकून का अहसास नहीं करने देती, क्योंकि सुजेना को भी चैन नहीं है. लेकिन, आप खुद को उसके करीब पाते हैं. वह आपकी रूह में सुरसुरी पैदा करती है. 

प्रियंका ने सुजेना के चरित्र को जीने में जी-जान लगा दी है और केंद्रीय पात्र का आभामंडल इतना असरदार है कि अरुण के अलावा बाकी सब किरदार गौण लगते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि उनका अभिनय कमतर है. हर कोई अपनी कहानी चलने तक बेहद प्रभावी हैं. यहाँ तक कि नील नितिन मुकेश और जॉन भी. नसीर और इरफ़ान अपनी टाईप्ड छवि के मारे हैं, पर ठीक हैं. अन्नू कपूर किरदार के अनुकूल हैं, और उषा उत्थुप तो पहली बार पता चला कि अदाकारा भी हैं. एक डार्क फिल्म में सिनेमेटोग्राफी कितनी प्रभावोत्पादक होनी चाहिए, यह रंजन पंडित ने दिखाया है.  

संगीत का जिक्र किये बगैर फिल्म पूरी नहीं हो सकती. फिल्म का काल और कैनवास काफी बड़ा है, इसलिए संगीतकार के रूप में विशाल ने कई प्रयोग किये है, जो अच्छे हैं. रूसी लोकगीत का प्रयोग भी. गुलज़ार हैं ही. उषा उत्थुप और रेखा भारद्वाज आवाज के जरिये फिल्म में कई रंग भरती हैं. पता नहीं क्यों, सुरेश वाडेकर का 'तेरे लिये' एल्बम में होने के बावजूद फिल्म से गायब है. बैकग्राउंड स्कोर बढ़िया है और कथा को सहारा देने में कामयाब है. 

विशाल की किस्सागोई पिछली फिल्मों में अच्छी रही है, पर यहाँ वे कुछ कथा कहने के तरीके को लेकर असमंजस में दिखाई देते हैं. वैसे भी, इतनी सपाट; पर परतदार कथा को कहना खेल नहीं. शायद यही कारण होगा कि पटकथा लिखने के लिये उन्हें विदेशी पटकथाकार की मदद लेनी पड़ी. यह भी कहना होगा कि निर्देशक, संपादन के स्तर पर भी चूक गया. फिल्म संपादक ए. श्रीकर प्रसाद ने अपना काम किया है, पर उन्हें निर्देशक की ओर से वह मदद नहीं मिली, जो फिल्म में कसाव ले आती. एक बात और... विशाल अपने गुरु गुलज़ार का फ्लैशबैक का जुनून समझ तो गए, पर इस हुनर में उतनी सफाई नहीं ला पाए हैं. नतीजा यह कि फिल्म की लय और गत बिगड़ गई. बहस इस पर भी हो सकती है कि क्या निर्देशक के पास खुद कथा कहने का माद्दा नहीं था, जो सूत्रधार और कथा-कथन का सहारा लेना पड़ा? निर्देशक की इससे बड़ी कमजोरी और क्या होगी? 

इसके बावजूद प्रयोगधर्मी विशाल को सराहे बगैर नहीं रहा जा सकता. 

सुनील सोनी 

गुरुवार, 24 मार्च 2011

रेतघड़ी



वक्त मुट्ठी से यों फिसला जा रहा है कि रेत हो. ऐसा भी हो कि हम ही रेतघड़ी की रेत में तब्दील हो गए हों. जब नए सूरज की प्रतीक्षा की सीमारेखा पर खड़े हैं तो कुछ सिरहन, कुछ स्फूर्ति के साथ अहसास हो रहा है, नई सदी/सहस्राब्दि के तीन पड़ाव (अब ग्यारह) दुनिया ने किस तेजी से मापे हैं ! महसूस यह भी होता है कि काल संभवतः गणनाओं में भाग रहा है, प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना होने के बावजूद आदमी भूत-गुफाओं की भूलभुलैयां में वहीं है, जहां सहस्राब्दियां उसे छोड़ आई थीं. सभ्य और नैतिक होने के मुहावरे उसने आत्ममुग्धता में गढ़े हैं, पर जब भी मौका आता है, भ्रम की केंचुल छोड़कर हकीकत में लौट आता है. उस दुनिया में, जहां अस्तित्व तथा सत्ता बचाने के लिए वह किसी को बख्शता नहीं. ग्रेगोरियन कैलेंडर में पहले दिन से ३६५वें दिन तक कितने वर्ष इसके गवाह हैं. दो हजार तीन भी.
जब साल का आखिरी दिन बीतने में कुछ ही घंटे शेष हैं, पीछे पलटकर देखता हूँ. ठिठक जाता हूँ... कितनी बदसूरत हो चली है धरती. कितने जख्म लगे हैं, कितने बदरंग दाग; तमाम सौंदर्य यों बिखरा है कि कुरूपता उसका हिस्सा हडपने लगी है. सचमुच ! सभ्य होने के दंभ भरने वाला आदमी इतिहास को कितने बार दोहराता है. युद्ध बार-बार इतिहास  के कैदखाने से निकल आता है, डराता है और मासूमियत के मुखौटों से क्रूरता छन-छनकर बाहर आने लगती हैं. बेच-खरीद के जुमले से दुनिया भर को मूर्ख बनाने वाला चतुर बाजार मानवीय रिश्तों को व्यापार बनाते चलता है. अफसोस ! यह अकेले आदमी के हिस्से में है. वही दुनिया में निर्णायक स्थिति में है. उनमें से भी कुछ सब-कुछ संचालित करने की ताकत रखते हैं. वे सत्ता-समीकरण तय करते हैं; मोहरे और वजीर रचते हैं; भव्य बाजार का मायाजाल बुनते हैं और दिव्यता के उन्माद के साथ छलते हैं; हथियार बनाते हैं/बेचते हैं, दवा के कारखाने लगाते हैं, बेचकर दुआएं भी पाते हैं.
वे समय भी तय करने लगे हैं यानी रेत हमारी मुट्ठी से फिसलकर उनकी हथेली में गिर रही है. वक्त ने हमारे पैरों के नीचे से जमीन खींच ली है और अंधकूप में बेतरह गिरते हुए दो हजार तीन बारह महीनों के तीन सौ पैंसठ दिन/रात में बँटकर यों गुजरा कि दो हजार चार ठोस पर शीशे की तरह साफ अस्तित्व के साथ हमारे बस ठीक सामने है.
नववर्ष कैसे मनेगा, कौन मनवाएगा और कौन मना पाएगा? की बहसों में न उलझते हुए भी यह पूछना जरूरी है कि क्यों हम एक ऐसी दुनिया के ‘यूटोपिया’ को अपने व्यक्तिगत कल्पना-संसार से अलग पाते हैं, जिसमें सब सुखी और खूबसूरत हों? क्यों हमारे रिश्तों में वह दोस्त/साथी/पड़ोसी  उतने ही मजबूत बंध से बँधा नहीं होता? जितना हमारा ‘परिवार’. क्यों ‘मेरी साड़ी से उसकी साड़ी सफेद’ जैसे सस्ते विज्ञापन हमारी जिदगी का हिस्सा बनने लगते है? क्यों जीवन की धुरी सहअस्तित्व के बजाय स्वअस्तित्व के केंद्रक पर टिक गई है? क्या यह महसूस बिल्कुल नहीं होता कि अच्छी दुनिया के लिए सभी लोगों की बेहतरी के अलावा कोई उपाय नहीं है? स्वाभाविक है, यह सवाल तो उठेगा ही कि अच्छी दुनिया और सुखी लोगों से क्या मतलब है और कैसे यह हो सकता है? कल्पना की उड़ान  का विस्तार यथार्थ तक कैसे होगा? लेकिन, यह मुमकिन है. बस ! दूसरों के लिए भी उतनी ही जगह छोड़नी होगी, जितनी हमने अपने लिए तय की है; यह देखते हुए कि कोई बचा न रह जाए. सहस्राब्दि ने दिखाया है कि बाजार कल्पनाओं के रोमांच को सच की सीमाओं में बाँध लाता है. वह इच्छाशक्ति ही कुछ कर पाएगी. बस, उद्देश्य ‘साझा दुनिया-बेहतर दुनिया’ हो.
अतीत हो रहे साल के जख्म इतने हरे हैं कि कुरेदने की जरूरत नहीं. पलक झपकती है तो तस्वीर खिंच जाती है... कैमरे की स्मृति में ‘शटर’ गिरने-उठने की तरह. तेल के मार्फत अर्थव्यवस्था पर कब्जे की हवस में सिन्धुघाटी  सभ्यता के बराबर दुनिया की सबसे पुरानी मैसोपोटामिया की सभ्यता को अमेरिकी-ब्रितानी बमों से जमींदोज होते देखा है और उतने ही पुराने बाम को प्रकृति के कहर से. दो साहसी बहनों को चिकित्सा विज्ञान का ‘गिनी पिग’ होते देखा तो आम आदमी की भगवान हो चुकीं मदर टेरेसा को धर्म के ठेकेदारों के हाथों ‘धन्य’ होने का खेल भी; राजनीति-नौकरशाही-अपराध जगत के सबसे बड़े गठजोड़ ‘तेलगी कांड’ को देखा तो दलाली की राजनीति के जूदेव-जोगी सिद्धांत भी. मुंबई बमकांड की पुनरावृत्ति से थर्राए भी. कई राज्यों में सत्ता बदलते देखी, मुख्यमंत्रियों का बदलना और ‘फीलगुड फैक्टर’ का दर्शन भी. रुपया चढ़ते देखा और शेयर बाजार भी. बस नहीं देखा तो जन के लिए बने तंत्र को जनता के पक्ष में जाते हुए. वह मरती रही, बेकारी, भुखमरी, गरीबी, आपदा और मानवजनित अन्याय से. भूमंडलीकरण ने नया कल्पनालोक रचा. वहाँ से इत्र की सुगंध जैसा ‘फीलगुड’ फैक्टर निकला. नेता ‘फीलगुड फैक्टर’ को सूंघते रहे, आनंद के समुद्रों में डूबते उतराते रहे. टूटी-फूटी सडकों पर जानदार सस्पेंशनवाली शानदार गाड़ियों से चलते रहे, महंगे होटलों में स्वादिष्ट भोजन से छकते रहे, आलीशान मकानों में ऐशोआराम से भर जाते रहे,  छतफाड़ ठहाके लगाते रहे, अफसर जीहुजूरी में सब सुख भोगते रहे. जनता देखती रही. हकीकत में भी, फिल्मों भी. उसकी नियति ही ऐसी थी.
‘नियति’ में निराशा का जो गहन भाव है, वह दो हजार चार के आगम को जरा कष्टकर कर सकता है, पर वक्त का हरेक क्षण बेहतरी के बीज सहेजे होता है. लेकिन, बीज कैसे बोया जाए, अंकुर फूटें, बिरवा से वृक्ष हो जाए; यह सब होगा कैसे? करेगा कौन? राजनेता, नौकरशाही, उद्योगपति, यही व्यवस्था? अमेरिका में भी आम चुनाव हैं; बुश को लडना है. भारत में भी आम चुनाव हैं. अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी को लडना है. देश का आधा साल चुनाव में जाना है. छोटे नेता-कार्यकर्ता से लेकर बडे नेता-कार्यकर्ता तक सब व्यस्त रहेंगे. बुश के पास सद्दाम का ‘फंडा’ है, अटल के पास ‘फीलगुड फैक्टर’ का. नकारने के बावजूद दोनों दो ध्रुवों के नेता हैं और दोनों कई दलों के गठबंधन का नेतृत्व करेंगे. जीते जो, देश में आगे ‘साझा सत्ता’ की राजनीति चलेगी.
लेकिन, सत्ता में काबिज होने की इस राजनीति में दुनिया के लिए कोई जगह नहीं है. पिचानवें फीसदी लोगों के लिए भाग्यविधाता बन बैठे राजनीतिक जो चाहेंगे होगा. वे वही करेंगे, जो बहुराष्ट*ीय कंपनियां कहेंगी. ये कंपनियां वही कहेंगी, जो दुनिया का अधिकतम मुनाफा छानकर उनके पास पहुँचा दे. सहस्राब्दि के चौथे पडाव के अंत में भी यही लिखा जाएगा, जो अभी लिखा जा रहा है, अगर हमने कुछ न किया. सिर्फ युद्धभूमि बदलेगी, करेंसी और तकनीक बदलेगी.
नया साल इतिहास को किताबों में दफन कर देने का सुनहरा मौका हो सकता है. थोड़ी-सी कोशिश कीजिए; हाथ बढ़ाइए  और थाम लीजिए वक्त को.


लोकमत समाचार में मैंने ये सम्पादकीय २००३ की ३१ दिसंबर को लिखा था. पहले सोचा था कि पहली जनवरी २०११ को पोस्ट करूँगा, पर नहीं कर पाया. अब कर रहा हूँ, क्योंकि ये अब भी मौजूं है. 

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

वलनीः छब्बीस बरस की गवाही

वलनीः छब्बीस बरस की गवाही
लेख : योगेश अनेजा
(योगेश अनेजा मेरे मित्र हैं और नागपुर से  22-23 किलोमीटर  दूर वलनी गाँव, जो अब नागपुर जिले के २२०० गाँव में से एकमात्र आदर्श गाँव बचा है, लगातार एक तालाब बचाने के संघर्ष में जुटे हुए हैं. उनकी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की  समझ अनोखी है. साथ ही संघर्ष के तरीके भी. वे नागपुर में मोटर पार्ट्स का एक छोटा-सा व्यापार करते हैं, पर दिल से अच्छे समाज के अविष्कारक हैं.) 

यह कहानी है नागपुर तालुका के गांव वलनी के लोगों की। वलनी में उन्नीस एकड़ का एक तालाब है। वलनीवासी 1983 से आज तक वे अपने एक तालाब को बचाने के लिए अहिंसक आंदोलन चला रहे हैं। छब्बीस वर्ष गवाह हैं इसके। न कोई कोर्ट कचहरी, न तोड़ फोड़, न कोई नारेबाजी। तालाब की गाद-साद सब खुद ही साफ करना और तालाब को गांव-समाज को सौंपने की मांग। हर सरकारी दरवाजे पर अपनी मांगों के साथ कर्तव्य भी बखूबी निभा रहा है यह छोटा-सा गांव। योगेश अनेजा, जो अब इस गांव के सुख-दुख से जुड़ गये हैं, वे 26 वर्ष लम्बी  दास्तान को बयान कर रहे हैं.
हम सब कलेक्टर के पास अर्जी लेकर गए थे। उन्होंने कहा कि मैं तो यहां नया ही आया हूं। मैं देखता हूं कि मामला क्या है। अर्जी के हाशिए में कोई टिप्पणी लिखकर उसे एस.डी.ओ. की तरफ भेजते हुए कहा कि अभी तो मंत्रीजी आ रहे हैं, मैं उन्हें लेने हवाई अड्डे जा रहा हूं। आप बाद में मिलिए।
अगली बार फिर उन्नीस किलोमीटर दूर से अर्जी लेकर चार-पांच साथियों को किसी तरह मनाकर जुटाकर कलेक्टर साहब से मिलने पहुंचा तो पता चलता है कि वे तो अभी एक बैठक में हैं। आज नहीं मिलेंगे। किसी कोशिश में मिल भी जाएं तो फिर वही सुनने मिलता है: नया आया हूं। आप कागज छोड़ दीजिए, देखता हूं क्या हो सकता है। फिर एक साल दो साल में जब तक मामला इनको समझ में आना शुरू होगा, तब तक इनकी भी बदली हो जाएगी।
तब फिर हम जाते हैं एस.डी.ओ. के पास। एस.डी.ओ. फोन उठाते हैं, तहसीलदार को बताते हैं कि तुम कुछ करो। ये लोग बार-बार मेरे पास आते हैं। एस.डी.ओ. लिखकर कुछ नहीं देते। फोन पर बात करते हैं ताकि उनकी कलम न फंस जाए कहीं।
अब फिर हम जाते हैं तहसीलदार के पास। तो तहसीलदार जो ऊपर के अधिकारियों के दवाब के कारण गांव जाकर मौका चौकसी कर चुके हैं, कहते है कि मैंने मालगुजार को जनवरी 2009 में एक हजार रुपए का दंड किया है और सात दिन के भीतर अतिक्रमण हटाने का नोटिस भी दे दिया है। इससे ज्यादा भला मैं क्या कर सकता हूं। अच्छा हो, अब तो आप कोर्ट जाओ।
तहसीलदार ने मालगुजार को सात दिन में अतिक्रमण हटाने का नोटिस दिया। इससे एक बात तो साफ है कि गांव वाले सच बोल रहे हैं। तालाब सरकारी है। पर ये सात दिन कब पूरे होंगे भगवान जाने।
कलेक्टर कहते हैं कि मैं कुछ नहीं कर सकता। एस.डी.ओ. कहते हैं कि मैं कुछ नहीं कर सकता, तहसीलदार कहते हैं मैं कुछ नहीं कर सकता। यदि ये लोग कुछ नहीं कर सकते तो तनखा क्या ये घापा करने की लेते हैं। इन पच्चीस, छब्बीस लाइनों में जो वर्णन किया गया है, वह दो चार दिन का किस्सा नहीं है। चौंक न जाएं आप! यह छब्बीस बरस का किस्सा है।
आज जो गांवों की दयनीय स्थिति हम देखते हैं, उनमें बहुत बड़ा हाथ उन लोगों का है, जिनकी नीतियों ने गांव वालों की काम करने की शक्ति ही छीन ली है। क्या पढ़ाई-लिखाई इसलिए जरूरी कही जा रही है कि जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, कमजोर हैं, अपनी आवाज नहीं उठा सकते, उनको दबा दिया जाए। आखिर यह पूरा मामला क्या है?
लीजिए सुनें पूरा किस्सा। नागपुर तालुका के गांव वलनी में उन्नीस एकड़ का एक तालाब है। 1983 में गांव के लोगों को पता चला कि जिस तालाब को वह अपना समझते हैं, वास्तव में वह उनका नहीं है। मालगुजार का है। पूर्व दिशा का पांच एकड़ तालाब मालगुजार ने किसी नागपुर वाले को बेच दिया। पश्चिम का नौ एकड़ एक और नागपुर वाले को बेच दिया और बीच का पांच एकड़ सरकारी है। गांव वालों की भोली बुद्धि ने सच समझकर इसे मान लिया और फिर से दो जून की रोटी के जुगाड़ में लग गए।
लेकिन गांव के कुछ लोगों को यह बात हजम नहीं हुई। तालाब के बीच में कोई दीवार तो है नहीं। फिर इसके तीन हिस्से हुए कैसे? तालाब की तरफ देखकर आंखें यह तय नहीं कर पा रही थीं कि तालाब कहां से कहां तक बिक गया है और कहां से कहां तक सरकारी है।
किसका कितना पानी है? तालाब में होने वाली मछली पर किसका कितना हक है? अब यह मछली तो सरकारी कागजात नहीं जानती। वह तो पूरे तालाब में कागजों पर बनी सीमाओं को तोड़ते मस्त इधर से उधर घूमती रहती है। तालाब की देखरेख का, उसकी मरम्मत का, कौन कितना जिम्मेदार है? गांव वालों को ये प्रश्न दिन रात सताने लगे।
एक आम आदमी को जो अधिकार दिया गया है, उसका इस्तेमाल कुछ गांव वालों ने करने की योजना बनाई। एक प्रार्थना-पत्रा लिखा गया और फिर शुरू हुआ न्याय पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्करों का एक और अंतहीन सिलसिला। न्याय की उम्मीद में कलेक्टर, एस.डी.ओ., तहसीलदार के पास पहुंच जाते व न्याय की फरियाद करते। लेकिन आप जानते ही हैं कि सभी सरकारी काम गोपनीय होते हैं। इसलिए गांव वाले इस आश्वासन के साथ कि जांच जारी है, वापिस गांव लौटा दिए जाते।
फिर एक दिन आया अण्णा हजारे का सूचना का अधिकार। कुछ गांव वालों ने इसका प्रयोग करना सीखा। प्रयोग किया तो तालाब के पुराने रेकार्ड तहसीलदार को मजबूरन देने पड़े। इसमें तो साफ लिखा था कि तालाब की मालिक सरकार है और पूरे गांव को इसके पानी पर हक है। पहले सिर्फ कुछ लोग ही इस तालाब की लड़ाई लड़ रहे थे। अब कागजात सामने आने के बाद पूरे गांव में जाग्रति आ गई और सचमुच यहां तो बच्चा-बच्चा यह कहने लगा कि यह तालाब हमारा है।
लेकिन जिन रेकार्ड ने पूरे गांव की आंखें खोल दीं, वे कागज सरकारी अधिकारियों की आंखें नहीं खोल पाए। तब हम सब क्या करते? कागज रखे एक तरफ और हमने खुद काम शुरू किया। अब वलनी गांव के लोग इस तालाब को पिछले पांच वर्ष से स्वयं के बलबूते पर खोद रहे हैं। हर वर्ष गर्मियों में तालाब के सूख जाने पर एक जे.सीबी. व चार टिप्पर किराए पर लिए जाते हैं। तालाब की मिट्टी खोदी जाती है।
साद किसानों के खेतों में डाल दी जाती है। प्रति टिप्पर चार सौ रुपए का खर्च आता है। जिस किसान को खेत में जितनी मिट्टी चाहिए हो, उतनी उसकी राशि वह ग्राम सभा द्वारा गठित कमेटी के पास जमा करा देता है। पिछले पांच वर्षों में इस तालाब पर ग्राम सभा ने सात लाख रुपए की खुदाई की है। तालाब भी गहरा हो गया है और साद, मिट्टी डालने वाले किसानों की फसल भी दो गुनी हो गई है।
अब गर्मियों में आसपास के 12 गांवों के पशु पानी पीने वलनी गांव आते हैं। और कहीं पानी नहीं होता।

यह है वलनी वासियों का अहिंसक आंदोलन। छब्बीस वर्ष गवाह हैं इसके। अपनी मांगों के साथ कर्तव्य भी बखूबी निभा रहा है यह छोटा-सा गांव। न कोई कोर्ट कचहरी, न तोड़ फोड़, न कोई नारेबाजी। सिर्फ फरियाद वह भी खुद से कि अब तो चेतो।

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बुधवार, 6 जनवरी 2010

नागपुर में सामाजिक आन्दोलनों का यथार्थ

नागपुर में सामाजिक आन्दोलनों का यथार्थ

सुनील सोनी

मध्य भारत में तीन सौ सालों से नागपुर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल का केंद्र रहा है. गोंड राजाओं के शासनकाल में नागपुर को नियोजित करने और उसे सड़क मार्ग से आसपास के इलाकों से जोड़ने की समझ-बूझ को मध्यकाल के अंतिम चरण में ऐसी उपलब्धि कहा जा सकता है, जिस्सने संभावनाओं के द्वारों को खोला. संभवतः शेरशाह सूरी के बाद यह इस इलाके के ढांचागत परिवर्तन से जुडी ऐसी पहल थी, जिसने उत्तरोत्तर गति पकड़ी. नागपुर से गुजरने वाली ग्रेट नार्दन रोड और ग्रैंड ट्रंक रोड सूरी की देन थीं. संभवतः यही प्रेरणा रही होगी, जो अंग्रेजों ने (भले ही अपने फायदे के लिए) रेलमार्गों के लिए इस जगह को चुना. इस जगह के बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकासक्रम में बुनियादी ढांचे ने प्रमुख भूमिका निभाई. शायद यही कारण रहा होगा कि नागपुर में राजनीतिक आंदोलनों की एक लम्बी परंपरा रही है, जिसमें पिछली सदी के जंगल सत्याग्रह और झंडा सत्याग्रह के अलावा पृथक विदर्भ राज्य आन्दोलन और नक्सल आन्दोलन तक गिनाये जा सकते हैं. वामपंथी कम्युनिस्ट और दक्षिणपंथी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गढ़ अगर नागपुर रहा है तो इसकी वजह यहाँ का सामाजिक तानाबाना और सामाजिक-आर्थिक स्थितियां रही हैं. निश्चय ही एक कारण इसके तत्कालीन राजधानी होने में भी निहित है, जिसके कारण सन्देश सीधे सत्ता तक पहुँचाने में आसानी रही. इतनी अधिक राजनीतिक गतिविधियों के बावजूद यहाँ चेतना का विकास उस तरह देखने को नहीं मिलता, जो एकरस जड़ता को तोड़ने में बहुत कामयाब हो. एक अंदाजा लगाया जा सकता है कि मध्य भारत में सामंती संरचना अब भी उतनी ही पुष्ट क्यों है, जितनी सौ-डेढ़ सौ साल पहले थी अथवा वास्तव में जिसे अपेक्षाकृत उदार समाज कहा जाता रहा है, क्या वह सचमुच में उदार था? ज़ाहिर है, तमाम आधुनिक समाजशास्त्रीय दर्शन इस तत्व को नकार देंगे. कोई शक नहीं कि मध्य भारत के सामाजिक ढांचे में बदलाव के कुछ गंभीर प्रयास नागपुर क्षेत्र में हुए. लेकिन वे अपर्याप्त रहे, क्योंकि उनको जिस तरह का प्रत्युत्तर मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया. पलट कर देखें तो नागपुर में न केवल प्रगतिवादी संत आन्दोलन भी दिखता है, बल्कि शैक्षणिक प्रवाह भी नज़र आता है. यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में कम उत्तेजना नहीं थी, पर वह बाह्य बल कमजोर दिखता है, जिससे महत्वपूर्ण बदलाव की उम्मीद बँधे. २०वीं सदी के शुरूआती तीन दशकों में कुछ ताकतें सक्रिय जरूर थीं और परिवर्तन गढ़ने में लगी थीं.

नागपुर को आंदोलित कर देने वाली सामाजिक हलचलों की चर्चा की जाये तो उसमें किसन फागुजी बंसोड़े (१८७०-१९४६) का नाम सबसे पहले लेना होगा. किसन फागुजी बंसोड़े को मूलतः एक मजदूर नेता की तरह देखा जाता है, जो उन्नीसवीं सदी के आखिर में दलित मिल मजदूरों को संगठित कर रहे थे, जिनकी संख्या कुल मिल मजदूरों में ४० प्रतिशत थी. लेकिन बंसोड़े वास्तव में एक चेतना एवं दूरदृष्टिसंपन्न विचारक और समाज सुधारक थे, जिन्हें आद्य पत्रकार और क्रन्तिकारी कवि के रूप में भी देखा जाना चाहिए. उन्होंने सबसे पहले मध्य भारत में सवर्णों को चुनौती दी और सत्ता तथा समाज में समानता के आधार पर भागीदारी की बात कही. वे लगातार भाषण देते रहे और लिखते रहे. पहले हस्तलिखित पत्रकों और बाद में कई अख़बारों में. इनमें से १९०२ से १९१८ के बीच चार अख़बार (मराठी दीनबंधु -१९०१-०२, निराश्रित हिंद नागरिक-१९१०, विटाल विध्वंसक -१९१३, मजूर पत्रिका- १९१८) उन्होंने खुद निकाले. उनके इस प्रयोग ने कट्टर हिन्दू समाज को झकझोर कर रख दिया और क्षेत्र के दलितों और अछूतों के बीच नए ढंग की सोच रखी. बंसोड़े नागपुर से कुछ दूर काटोल के मोहपा गाँव में पैदा हुए और संभवतः उन पर शिक्षा हासिल करने के दौरान ईसाई मिशनरी का काफी प्रभाव पड़ा. इसे उन्होंने सकारात्मक ढंग से इस्तेमाल किया. जाति उन्मूलन के लिए उन्होंने तत्कालीन संत चोखामेला, जो दलित होने की वजह से सवर्णों की बीच मान्य नहीं थे, के दलितों और अछूतों पर प्रभाव को समझा और जनजागरण की मुहिम में काम में लिया. यह कारगर तरीका था, जिससे पैदा चेतना ने इस इलाके में डा. आम्बेडकर को उनकी बुनियाद ज़माने में काफी मदद दी और इसी को आगे बढ़ते हुए उन्होंने धर्मं परिवर्तन के लिए नागपुर को चुना. यह देखना अचरज भरा होगा कि बंसोड़े, गाँधी के समकालीन हैं और दोनों के आन्दोलन तथा प्रचार के तरीके मिलते-जुलते हैं. लेकिन बंसोड़े कभी इंग्लैंड या दक्षिण अफ्रीका नहीं गए, जबकि गाँधी सीमोल्लंघन करके वहां गए और यूरोपीय क्रांतियों, संगठन-संस्थाओं, वैज्ञानिक समझ-बूझ तथा शासकों के दुर्व्यवहार से परिचित हुए. बंसोड़े को ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि वे खुद जाति प्रताड़ना सहते हुए बड़े हुए. लेकिन वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग और प्रतीकों के इस्तेमाल उन्होंने खुद सीखे और प्रयुक्त किये. बंसोड़े ने मिल मालिकों को तो झुका लिया और मजदूरों की अधिकतर मांगें पूरी हो गईं. लेकिन सवर्णों को सिर्फ झकझोर पाए. ये हुआ कि दलितों-अछूतों और सवर्णों के बीच इस मुद्दे पर जागृति पैदा हुई तथा उनमें से कुछ लोग इस दिशा में काम करने पर राजी हुए.

इसकी अगली कड़ी के तौर पर हमें जाईबाई चौधरी का नाम लेना होगा, जिन्होंने वह काम किया, जो उस वक्त अधिसंख्य सवर्णों ने भी स्वीकार नहीं किया था. महिलाओं की स्थिति दलितों के बीच अतिदलित की थी. जाईबाई ने इस स्थिति को बदलने के लिए छोटा-सा अभियान शुरू किया, जो बाद में महान मुहिम में बदल गया. जाईबाई के माता-पिता १८९६ में मजदूरी करने नागपुर आ गए थे और मिशनरी स्कूल में प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही ८-९ साल की आयु में ही (१९०१) उनकी शादी बापूजी चौधरी से कर दी. घर चलने के लिए उन्हें मजदूरी करनी पड़ी और वे नागपुर से कामठी तक की १० किमी दूरी सिर पर बोझ लेकर आती-जाती थीं. उसी वक्त मिशनरी मिस ग्रेगरी ने उनकी प्रतिभा और पीड़ा को पहचान लिया. उनके प्रयासों से टिमकी के मिशन स्कूल में वे शिक्षक बन गईं, पर सवर्ण अभिभावकों ने उनका बहिष्कार कर दिया. उस रोज जाईबाई ने नौकरी छोड़ दी और दलित -अछूत लड़कियों के बीच शिक्षा का उजाला फैलाने लगीं. वे घर-घर जाकर लड़कियों को पढातीं और चंदा जमा करतीं. धुन की पक्की जाईबाई ने १९२२ में मंगलवारी की न्यू कालोनी में संत चोखामेला गर्ल्स स्कूल खोल लिया, जिसकी देखा-देखी कई कन्या शालाएं क्षेत्र में खुल गईं. यह संभवतः बंसोड़े का ही कमाल था कि उनका एक प्रतीक यहाँ इस्तेमाल हो रहा था और जो लहर उन्होंने उठाई थी, वह नए रूप में और बड़ी हो गई थी. १९३० में नागपुर में जब पहली महिला परिषद् हुई तो जाईबाई उसकी स्वागत समिति की सचिव बनीं. आजादी मिलने तक अच्छी खासी संख्या में दलित लड़कियां पढ़-लिख चुकी थीं और कुछ सफेदपोश नौकरियों में भी आ गई थीं और आत्मनिर्भर होने की दिशा में पैर रख रही थीं.

लेकिन बाबू हरदास और उनके रामटेक सत्याग्रह के उल्लेख के बिना यह क्रांति अध्याय अधूरा रह जायेगा. बाबू हरदास (१९०४-३४) ने बंसोडे और जाई बाई के काम को आगे बढ़ाया. १९२१ में उन्होंने दलितों में जागृति लाने के लिए एक अख़बार 'महाराठे' निकला और बीड़ी मजदूरों का शोषण रोकने के लिए सहकारिता के आधार पर काम शुरू किया. महिलाओं की दशा सुधरने के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र खोला. १९२२ में उन्होंने महार समाज संगठन और एट्रोसिटी रोकने के लिए महार सेवक पथक बनाया. ये संगठन दलितों के बीच अनुशासन लाने का काम भी करता था. दलितों में एका लाने के लिए उन्होंने उपजाति कतमा करने के प्रयास किये. १९२३ में उन्होंने गवर्नर से असेम्बली और नगरीय निकायों में दलितों का प्रतिनिधि नामित करने की मांग की. समुदाय में शिक्षा का प्रसार करने के लिए उन्होंने कई नाइट स्कूल खोले और अंधविश्वास ख़त्म करने के लिए 'मंडई महात्म्य' नाम की पुस्तक लिखी, जिसका काफी असर हुआ. उन्होंने १९२७ में किसान फागुजी बंसोडे की मौजूदगी में नागपुर के पास स्थित रामटेक में दलित समुदाय से आह्वान किया कि वे रामटेक के मंदिर में पूजा न करें और न ही गंदे अम्बाडा तालाब में नहायें. साथ ही नासिक में मंदिर प्रवेश आन्दोलन में भाग लेने के लिए एक दल भेजा. १९३० में नागपुर में दलित परिषद के आयोजन में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई, जिसमें डा. आंबेडकर की मौजूदगी में दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की गई. यहीं ऑल इंडिया डिप्रेस क्लास फेडरेशन का गठन हुआ और वे सह सचिव चुने गए. १९३२ में उन्होंने मध्यप्रदेश बीडी मजदूर संघ की स्थापना की. १९३७ में वे नागपुर-कामठी से असेम्बली सदस्य चुने गए. बाबू हरदास ने छोटे से जीवनकाल में दलित समुदाय का चेतना स्तर काफी ऊंचा उठा दिया.

तीसरे और चौथे दशक में बहुमुखी प्रतिभा के धनी विद्वान (तिलक ने उन्हें 'विद्वत रत्न' की उपाधि दी थी) एड. केशव लक्ष्मण दप्तरी ने वह महत्वपूर्ण काम कर दिखाया, जो तत्कालीन समाज में लगभग असंभव था. वकालत के आजीविका के साधन होने के बावजूद उन्होंने ऐसे मुक़दमे लड़ने से इंकार कर दिया, जो झूठे हों. सत्यनिष्ठा के प्रति उनका आग्रह तत्कालीन समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा संघर्ष था, जिसमें हर कदम पर कांटे थे. बाद में गाँधीजी के कहने पर उन्होंने वकालत छोड़ दी और होमियोपैथी प्रैक्टिस शुरू कर दी. विवेकपूर्ण बुद्धिसम्मत दृष्टि होने के कारण उन्होंने भगवान के अस्तित्व से इंकार कर दिया और धर्म को विषय बनाकर आधा दर्जन ग्रन्थ लिखे, जिनमें से एक धर्म रहस्य स्वरूप भी था. धर्म की आड़ में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा पोंगापंथी की पोल खोलने उनके इस कदम ने हिन्दू समाज को भारी झटका दिया. गणित के विद्वान होने की वजह से उन्होंने ज्योतिष पर 'पूरण कल्प लता' नामक ग्रन्थ भी लिखा. १९२२ से १९३६ तक उन्होंने समविचारी साथियों को इकट्ठा किया और अस्पृश्यता निवारण मुहिम चलाई. इससे हिन्दू समाज के ठेकेदारों में खलबली मच गई. उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया. लेकिन उनके इस कदम ने सवर्ण हिन्दू समाज में ये बहस छेड़ दी कि दलितों और अछूतों को मुख्यधारा में लाया जाना चाहिए.

१९२९ में अमरावती की चांदूर तहसील के मंगरूल दस्तगीर गाँव से एक मुहिम चली, जिसे स्थानीय आबादी में संत का दर्जा पा चुके गणपति हरि महाराज ने उनकी मलिकी वाले विट्टल मंदिर के द्वार अछूतों के लिए खोल दिए. उन्होंने इसके लिए कोलकाता से अछूतों के प्रमुख नेता विराट चन्द्र मंडल को बुलाया. उसके बाद सैकड़ों सवर्णों और अछूतों ने एकसाथ महागू मातंग के घर भोजन किया. उन्होंने यह बाकायदा वरहाड़-मध्यप्रांत बहिष्कृत-सवर्ण परिषद का गठन करने के बाद एक प्रस्ताव पारित करके किया. उन्होंने सरकार को ज्ञापन भिजवाकर गोलमेज परिषद से लेकर हर स्तर पर अछूतों की नियुक्ति और शिक्षा-हॉस्टल की व्यवस्था करने की मांग की. उन्होंने कुछ सूत्र दिए, जिनमें जाति छोड़कर अजात होना प्रमुख था. इसके अलावा सर्वधर्म सद्भाव, स्त्री स्वातंत्र्य, स्त्री शिक्षण, चमत्कार निषेध, पिंडदान-श्राद्ध खंडन, बाल विवाह निषेध, विधवा विवाह करने, सदा विवाह करने और दहेज़ न लेने जैसे क्रन्तिकारी विचार रखे. सैकड़ों लोग जाति छोड़कर अजात बने और इसकी आंच नागपुर तक पहुंची. लेकिन संत के देहांत के बाद यह आन्दोलन इलाके तक ही सिमटकर रह गया.

इस बात का उल्लेख किये बिना नहीं रहा जा सकता कि नागपुर समेत पूरे विदर्भ की अर्थव्यवस्था अधिकतर समय गैरमराठी साहूकारों के हाथ में रही. नागपुर के भोंसलों की राजधानी होने की वजह से यहाँ घटाटे, चिटनवीस, बूटी जैसे साहूकार और जमींदार थे. लेकिन जब अमेरिका में गृहयुद्ध की वजह से लैटिन अमेरिका से ग्रेट ब्रिटेन को कपास नहीं मिल पाया तो वहां की कपडा मिलें बंद होने लगीं. विकल्प के तौर पर अंग्रेजों का ध्यान विदर्भ के कपास की ओर गया. उन्होंने तेजी बरतते हुए नागपुर-बॉम्बे रेल लाइन तैयार कर ली. बॉम्बे को १८६४ में अकोला और १८६६ में नागपुर से जोड़ दिया गया. कपास ढोई जाने लगी, ताकि इंग्लैंड ले जाया जा सके. अंगेजों ने ज्यादा दाम देकर कपास खरीदी तो कपास का रकबा बढ़ गया. इस बीच ढुलाई में तेजी लाने के लिए अंग्रेजों ने रेल लाइन दोहरी कर दी. अर्थव्यवस्था में तेजी से परिवर्तन आया. किसानों की आमदनी बढ़ी और उद्योग-धंधे भी बढ़ने लगे. चूंकि स्थानीय मराठी मानुष का ध्यान इस बदलाव की ओर नहीं था, इसलिए गुजराती और मारवाड़ी समुदाय ने इसका फायदा उठाया. उन्होंने धंधे और कारखानों में पैसा लगाया. वे ही साहूकारी भी करने लगे. पैसा बढ़ा तो डॉक्टर-वकील भी दूसरे प्रान्तों से आने लगे. नागपुर तो वैसे भी कॉस्मोपोलिटन समाज था. अर्थव्यवस्था परप्रांतीयों के हाथ में आने से उनका राजनीतिक दखल भी काफी रहा और उसने ब्राह्मण नेतृत्व की मदद की. चूंकि ब्रह्मनेतर नेता भी उनके साथ थे, तो एक-दो दफे छोड़कर पश्चिम महाराष्ट्र की तरह यहाँ ब्रह्मनेतर आन्दोलन का असर नहीं दिखता. संत गुलाब महाराज, संत गाडगे महाराज और संत तुकडोजी महाराज ने भी परंपरा और कर्मकांड के विरोध में जनजागृति की, पर सभी को सामंजस्य के साथ चलने की सलाह दी.

यह वही समय था, जब नागपुर में और कुछ क्रांतिकारी घटनाएं घट रही थीं, जिन्होंने इतिहास का रुख मोड़ दिया. पूरे मध्य प्रान्त में उस समय जचकी के लिए कोई ऐसा अस्पताल नहीं था, जहाँ भेदभाव न होता हो. बाल विवाह खूब होते थे और मृत्यु दर काफी अधिक थीं. विधवा विवाह नहीं होते थे और उन्हें काफी कड़े नियम-कानूनों के बंधन में बड़ी ख़राब स्थितियों में रहना पड़ता था. कमलाबाई होस्पेट भी किशोरावस्था में ही विधवा हो गईं. लेकिन मुंडन से पहले ही उनके भाई दत्तात्रय कृष्ण मोहनी उन्हें विरोध के बावजूद मायके ले आये और लेडी डफरिन अस्पताल में प्रसूति विशेषज्ञ के पाठ्यक्रम में प्रवेश दिलवा दिया. इसका भी काफी विरोध हुआ, क्योंकि ब्राहमणों में ऐसे काम का निषेध था, जिसमें खून बहता हो. अस्पतालों में सिर्फ मिशनरी ये काम किया करते, जबकि देशज ज्ञान के सहारे दाई घर में ही प्रसव करवाती थी. उनके बाद दो और ब्राह्मण विधवाओं ने पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया. पहली सावित्रीबाई मटंगे (ऑल इंडिया रिपोर्टर के संस्थापक वामन वासुदेव चितले की बहन) और दूसरी वेनुबाई नेने (वे पटवर्धन स्कूल में शिक्षक, एक लेखक और विदर्भ साहित्य संघ के पदाधिकारी की बहन थीं). कमलाबाई ने बाद में वहां काम करते हुए जब मिशनरियों के भेदभाव को देखा और अपमान सहा, तो उन्होंने अपनी दोनों साथियों के साथ मिलकर एक प्रसूति गृह की स्थापना का संकल्प किया, जिसमें किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं किया जाये. १९२१ में छोटे से प्रसूति केंद्र मातृ सेवा संघ की स्थापना हुई और फिर वह मध्य प्रान्त का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा शाखाओं वाला स्त्री चिकित्सालय बन गया. अब भी उसकी विदर्भ, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ मिलकर ९ शाखाएं हैं. कमलाबाई के हौसले ने न केवल मातृ-शिशु मृत्युदर में कमी ला दी, बल्कि हिन्दू महिलाओं को ऐसे बंधन से आजाद करवाया, जो सपना ही था. नागपुर के सेन्ट्रल म्यूजियम में कमलाबाई की तस्वीर इसका प्रमाण है.इसी मोहनी परिवार की एक लड़की दमयंती थेरगाँवकर तलाक़ के बाद समुद्रोल्लंघन करके न सिर्फ इंग्लैंड गईं, बल्कि वहां दूसरी शादी भी की. उनके भाई परशुराम थेरगाँवकर ने बावजूद एक विधवा से विवाह करके हिन्दू समाज को सकते में दल दिया. बाद में ये काम मिसाल बन गए. सारे ज़माने के विरोध के बीच घर की दहलीज़ लांघकर अनसूया वाडेगाँवकर ने वह काम किया, जिसे मध्य प्रान्त की रंगभूमि हमेशा याद रखेगी. उन्होंने रंगकर्म में तब भागीदारी की, जब कोमलांग पुरुष स्त्री वेश धरकर नारी किरदार निभाया करते थे. यही क्रान्तिधारा रंगभूमि में अब तक प्रवाहित हो रही है.


एक घटना का जिक्र जरूरी है, जो नागपुर के शैक्षणिक इतिहास का अहम फैसला है. स्वतंत्रता आन्दोलन के वक्त हैदराबाद में उन दिनों निजाम के खिलाफ 'वन्दे मातरम' आन्दोलन चल रहा था, जिसमें अधिसंख्य कालेज छात्र शामिल थे. स्वतंत्र भारत के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत पी. वी. नरसिंहराव भी उनमें शामिल थे. निजाम के कहने पर यूनिवर्सिटी ने सभी छात्रों को रेस्टीगेट कर दिया. परीक्षा करीब थी और उनका भविष्य ख़राब होने की आशंका थी. नागपुर के सिटी कालेज के प्राचार्य श्री पंढरीपांडे ने अंग्रेजों की नाराजगी की परवाह किये बिना उन छात्रों को प्रवेश दिया और उनके अनुरोध पर नागपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति दादा तुकाराम जयराम केदार ने उन्हें परीक्षा में बैठने का मौका दिया. इस घटना से नागपुर विश्वविद्यालय का सम्मान तथा रुतबा बढ़ गया.

नागपुर समेत पूरे मध्य प्रान्त में मुसलमानों की स्थिति भी बहुत खराब थी. सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक, तीनों क्षेत्रों में वे पिछड़े हुए थे. एड. मोहम्मद सईद हयात ने १९२९ में मुसलमानों, खास तौर पर मोमिन अंसारी बिरादरी के बीच शिक्षा का प्रसार करने के लिए 'मुट्ठी फंड' अभियान चलाया. इसमें हर मोमिन बुनकर ने कपड़े के हर धागे के हर छिद्र पर एक पैसा दिया. उस पैसे से हर मोमिन के पुत्रों की मैट्रिक तक शिक्षा की व्यवस्था की गई. उन्होंने मोमिनपुरा इस्लामिक हाईस्कूल की स्थापना की, जिसमें परंपरागत धार्मिक शिक्षा के बजाये अंग्रेजी पद्धति से शिक्षा दी जाती थी. इससे मुसलमानों में नाराज़गी फ़ैल गई, पर जब उद्देश्य समझाया गया तो वे मान गए. उन्होंने अंजुमन हामी इ इसलाम नाम की संस्था बनाई, जो उस समय हाई स्कूल तक था और अब पॉलीटेक्निक तक है. बाद में वे राजनीति में कूद गए और मध्य प्रान्त एवं बरहाड़ मुस्लिम लीग के प्रमुख बन गए. विभाजन तक वे जिन्ना के साथी रहे. बाद में उन्होंने महाविदर्भ आन्दोलन में हिस्सेदारी की. वे सूफी परम्परा के कायल और विद्वान थे. उनके ही कारण नागपुर में मुसलमानों में अपेक्षाकृत शिक्षा का स्तर ऊंचा है.

किसी भी अच्छे समाज की निशानी उस समूह में रहने वाले कमजोर और निःशक्त लोगों को समानता का मौका देना और उन्हें उसके लिए तमाम अवसर उपलब्ध करवाना होता है. नागपुर में सदी के पूर्वार्ध में ही नेत्रहीन एवं मूक-बधिर शालाएं स्थापित हो गई थीं. गांधीजी के सेवाग्राम आश्रम में १९२१ से ही कुष्ट रोगियों की देखभाल का काम करते-करते मनोहर दीवान ने इसे जीवन का लक्ष्य बना लिया और बाद में १९३७ में दत्तपुर में महारोगी सेवा मंडल की स्थापना की. उसके बाद बाबा आमटे का आनंदवन कुष्ठ रोगियों का सबसे बड़ा शरणस्थल बना. मातृसेवा संघ ने भी दो काम किये. पहला मतिमंद बच्चों के लिए स्कूल खोले और अनाथ बच्चों के लिए मेडिकल कालेज में एक केंद्र खोला. अनाथ बच्चों के सबसे बड़े पालनपोषण केंद्र के रूप में श्रद्धानंद अनाथालय का जिक्र किये बिना कोई भी उल्लेख अधूरा होगा. नागपुर हमेशा नशाबंदी आन्दोलन का प्रमुख केंद्र रहा है. डा. चोलकर, महात्मा भगवानदीन और उदाराम पहलवान के नेतृत्व में आन्दोलन ने विराट रूप ले लिया. लेकिन १ जनवरी १९२३ को निकाले गए जुलूस पर अंग्रेजों की गोलियां बरसीं और १० लोग मरे गए. गोलीबार चौक उसी की याद है. उस आन्दोलन की एक अन्तःधारा अब भी मौजूद है और नागपुर शहर समेत अलग-अलग जगह ऐसे आन्दोलन होते रहते हैं. कानूनी सहारे के बावजूद कुछ जगह ही सफल होते हैं, बाकी जगह मिलीभगत और साजिश की भेंट चढ़ जाते हैं.

नागपुर में सांस्कृतिक आन्दोलनों में सबसे प्रमुख ललित कला भारती का समानांतर समग्र कला आन्दोलन रहा. इसमें पथ नाटक, पथ काव्य, पथ पेंटिंग, पथ नृत्य समाहित था. श्रीपाद भालचंद्र जोशी के नेतृत्व में ये आन्दोलन परवान चढा और एक कालावधि के बाद नेपथ्य में चला गया. मराठी रंगमंच को नागपुर से ही नुक्कड़ नाटक आन्दोलन मिला, जो अब भी छिटपुट जारी है. जन साहित्य और दलित साहित्य आन्दोलन भी थोड़ी-बहुत हलचल मचाकर समय के साथ लुप्तप्राय हो गए.

आज़ादी के बाद नागपुर में कई परिवर्तन आये. नौ साल बाद ही वह महाराष्ट्र नामक नए राज्य का हिस्सा बन गया और राजधानी के बजाय दुय्यम शहर बनकर रह गया. इस दौरान वह विदर्भ राज्य समेत कई राजनीतिक आंदोलनों का गवाह बना. लेकिन सामाजिक आन्दोलन लगभग ठहर गए. सिर्फ नक्सलवादी आन्दोलन को छोड़ दिया जाये तो लगभग पॉँच दशक से हर जगह खामोशी है. बीच-बीच में कुछ पत्थर तालाब के शांत पानी में पड़ते हैं तो हलचल होती है, पर बहुत देर तक कायम नहीं रहती. इसके बावजूद कुछ जिन आन्दोलनों का जिक्र किया जा सकता है, उनमें अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की तीन दशकों की लगातार मुहिम है, जिसे वरिष्ठ पत्रकार-समाजकर्मी उमेश चौबे और हरीश देशमुख मिलकर चला रहे हैं. हालाँकि इसके बावजूद अब तक इस बुद्धिवादी आन्दोलन को जनाधार की तलाश है. हुंदा विरोध आघाडी ने एक ज़माने में अच्छा काम किया, पर अब उसका विसर्जन हो चुका है. धर्मनिरपेक्ष आन्दोलन भी शुरुआती चमक के बाद लापता है. मजदूर यूनियंस जरूर अलग-अलग टापुओं पर कुछ काम कर रही हैं, पर समग्रता में आसमान के तारे बन चुकी हैं.

यह कहा जा सकता है कि फिलहाल नागपुर समेत पूरे विदर्भ में (बल्कि समूचे देश में) जनांदोलनों के बजाय एनजीओ संस्कृति हावी है और उसका बदतर रूप यहाँ देखा जा सकता है. (बेशक, अँगुलियों में गिनने लायक कुछ एनजीओ बढ़िया काम भी कर रहे हैं). बिना किसी जन जवाबदेही के अधिकतर एनजीओ देसी-विदेशी फंड का इस्तेमाल ऐसे अनुत्पादक कामों में कर रहे हैं, जिनकी समाज को भनक तक नहीं लगती. पॉश होटलों-रिसोर्टों में बैठकें-संगोष्ठियाँ, लिमोजिन से जरा-सी कम गाड़ियां, देश-विदेश की लगातार यात्राएं और लक्जरी खरीद-ओ-फरोख्त, शानदार प्रेस ब्रीफिंग एवं मीडिया कम्युनिकेशन, कारपोरेट कल्चर और बिना किसी गलती के बिल और अकाउंट उनकी खासियत हैं. सिर्फ उनका काम जनता और जनता के वास्तविक मुद्दों को खारिज करना है.

इसके बावजूद राहत यही है कि कहीं-कहीं अच्छा काम भी हो रहा है, जिसके दीर्घकालिक परिणामों की उम्मीद की जा सकती है. इनमें सबसे अच्छा काम राम इंगोले कर रहे हैं. वे नागपुर की वारांगना बस्ती गंगा-जमुना की सेक्स वर्कर्स (जानबूझकर वेश्याओं नहीं लिख रहा, क्योंकि उससे सडांध भरे दिमाग की घिनौनी तस्वीर बनती है) के बच्चों को अलग रखकर पढ़ाते-लिखाते हैं. खासकर लड़कियों को. नौकरी करते हैं. कुछ पैसा खुद लगते हैं. कुछ उधर लेते हैं और कुछ चंदा या दान मिल जाये, तो भी ले लेते हैं. भीषण किस्म की कठिनाइयाँ सहते हैं, घबराते भी हैं, पर काम कभी छोड़ते नहीं.

सीमा साखरे भी उनकी सीमाओं के बावजूद बेहतरीन काम कर रही हैं. वे पीड़ित महिलाओं की हर किस्म से सहायता करती हैं और शरण देती हैं. उनका वास्तविक पुनर्वास भी करवाती हैं. अधिकांश चुपचाप और कुछ चिल्लाकर वे लगातार काम में जुटी हुई हैं.

सावनेर के पास टाकली गाँव में बरसों से खामोशी से पुष्प बेन देसाई भंसाली सेवाश्रम के नाम से स्कूल चला रही हैं. गांधीवादी हैं और स्कूल भी वैसे ही चलती हैं. शिक्षा पर जो काम उन्होंने किया है, उससे बड़ी उम्मीद बंधती है.

शिक्षा के क्षेत्र में वर्धा के गाँव में सुमन ताई बंग 'चेतना विकास' नाम से एक कार्यक्रम चला रही हैं. वे अपनी पुत्रवधू पद्मजा के साथ गाँव-गाँव जाकर अनौपचारिक शिक्षा का अलख जगा रही हैं. कई सालों से जारी काम के कुछ अच्छे नतीजे आये हैं. वर्धा में ही सुषमा शर्मा 'नई तालीम' के मार्फ़त गांधीजी का सपना साकार करने में लगी हुई हैं. सुमन ताई और ठाकुरदास बंग के दूसरे पुत्र-पुत्रवधू अभय और रानी बंग भी 'सर्च' के बैनर तले स्वास्थय पर काम कर रहे हैं. गढ़चिरोली के हेमलकसा में बाबा आमटे के पुत्र-पुत्रवधू डा. प्रकाश और डा. मन्दाकिनी आदिवासियों से संवाद की लम्बी प्रक्रिया में जुटे हैं, जबकि डा. सतीश गोगुलवार और शुभदा देशमुख 'आम्ही आमच्या आरोग्य साठी' के बैनर तले नागपुर से गढ़चिरोली तक शहरी गरीबों से लेकर आदिवासी महिलाओं तक के स्वास्थ्य पर काम कर रहे हैं. मेलघाट में डा. रवि और स्मिता कोल्हे देशज ज्ञान और कुपोषण के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं. ये सब एनजीओ हैं, पर चोखा काम कर रहे हैं, जो वास्तव में फायदा पहुँचायेगा.

नागपुर में होने वाली कुछ और ऐसी हलचलों का जिक्र करना जरूरी है, जो वास्तव में क्रांति लहर साबित हो सकती थीं, पर कुछ सीमाओं और वजहों से ऐसा नहीं हो पाया. ऐसा ही एक आन्दोलन एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांध गोसीखुर्द बांध के चलते करीब सौ-सवा सौ गाँव के लोगों के विस्थापन के विरोध में था. भंडारा और नागपुर जिले में स्थित इस बांध से बहुत कम लोगों (संभवतः चंद्रपुर के ११ गाँव को सिंचाई सुविधा) को फायदा हो रहा था, जबकि इसके नुकसान बहुत थे. गोसीखुर्द प्रकल्पग्रस्त संघर्ष समिति के तत्वावधान में विलास भोंगाड़े ने लगातार विस्थापितों को संगठित किया और शुरुआती वर्षों में काफी प्रभावी ढंग से आन्दोलन चलाया. उनका मुख्य मुद्दा नर्मदा बचाओ आन्दोलन की तरह बांध का विरोध नहीं था. वे पुनर्वास ठीक से करने और बेहतर मुआवजा देने के लिए लड़ रहे थे. लेकिन नकदी मुआवजा बंटने तथा बांध पूरा होने में १५-१७ साल की देरी से विस्थापितों की रूचि कम हो गई, क्योंकि वे दोहरे लाभ में थे. वे काफी सालों तक अपनी ही जमीन जोत रहे थे तथा फसल उगा रहे थे. कार्यकर्ताओं तथा नेतृत्व में मतभेद के चलते बाद में आन्दोलन में फूट पड़ गई और उसकी ताकत कम हो गई. राजनेताओं और प्रशासन ने इसका फायदा उठाया. हकीकत ये भी है कि एनजीओ की दिलचस्पी बढ़ जाने और संघर्ष का स्पष्ट रोडमैप न होने की वजह से विस्थापितों में ये समझ बनी कि यह लडाई नकली है. नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने एक बहुआयामी लड़ाई लड़ी, जिसमें उन्होंने व्यवस्था को झुकाने के हर औजार का इस्तेमाल किया और संघर्षरत लोगों के जीवन में परिवर्तन लाने के लिए सकारात्मक कदम भी उठाए. यहाँ ऐसा नहीं हुआ. उसकी वजह वर्ग का अलग होना भी था. इन सीमाओं के बावजूद ये आन्दोलन मध्य भारत में एक मिसाल कायम कर पाटा, अगर वो अपनी प्राथमिक मांगों को भी पूरा करवा पाता. लेकिन अब भी बेहतर मुआवजा और बढ़िया पुनर्वास एक सपना है. आन्दोलन अब भी जारी है, पर धार कुंद हो गई है.

नागपुर में जल, जंगल, जमीन की लड़ाई को लेकर व्यापक पहल हुईं, पर वे हलचल पैदा नहीं कर पाईं. पूरे मध्य भारत में संसाधनों पर कब्जे की लड़ाई को लेकर नागपुर में हो रही गतिविधियाँ बड़ा परिवर्तन ला सकती थीं. लेकिन जब तक जंगलवासियों के हक़ में कानून बना, तब तक आग ठंडी हो गई, जबकि वह फैलने लगी थी. इसकी वजह नेतृत्व में असमंजस, दिशाभ्रम और लड़ाई की तैयारी न होना था.

'कसेल त्याची जमीन' जैसे कानून के बावजूद प्रशासनिक लालफीताशाही और हठधर्मिता के खिलाफ जबरन जोत (सरकारी जमीन पर भूमिहीनों का कब्जा और खेती) को नियमित करने को लेकर बड़ा आन्दोलन खडा हुआ. अलग-अलग वक्त में विदर्भ में कई लोगों ने ये आन्दोलन चलाया, पर वह निरंतरता के अभाव और नेतृत्व की विफलता के चलते कोई प्रभाव डालने अथवा बदलाव करने में सफल नहीं हो पाया.

सबसे महत्वपूर्ण पहल के रूप में जिसका उल्लेख किया जा सकता है, वो नागपुर से ७ किमी दूर वलनी नामक एक गाँव में एक मालगुजारी तालाब पर ग्रामसभा के कब्जे को लेकर चली लड़ाई थी. इस तालाब पर मालगुजार ने कब्जा कर लिया था और उसे सुखाकर खेत बनाकर बेच रहा था. एक पर्यावरणवादी योगेश अनेजा ने गाँव में अलख जगाई और कानूनी और भौतिक लड़ाई लड़ी. उनका साथ गाँव के ही केशव डम्भारे और उनके साथियों ने दिया. उन्होंने दो काम किये. एक तो ग्रामसभा की ताकत का इस्तेमाल किया और दूसरे डिगर मशीनों से तालाब खोदा और उसकी उपजाऊ मिट्टी आसपास के किसानों को बेची. इससे किसानों का समर्थन मिला और आन्दोलन के लिए पैसा भी. अब भी वह आन्दोलन चल रहा है. मालगुजार से कानूनी लड़ाई जारी है. लेकिन इस आन्दोलन से प्रेरणा लेकर दूर-दूर तक कई छोटे-मोटे प्रयोग हुए. ये सब जल संरचनाओं को बचने और सहेजने के संघर्ष थे.

नागपुर में विचार के स्तर पर प्रयोगधर्मी काम कम हुए हैं. उनमें एक 'आजचा सुधारक' नामक मराठी जर्नल का यहाँ से पुनर्प्रकाशन था. डेढ़ सदी पहले गोपाल गणेश आगरकर ने पुणे में इस पत्रिका के मार्फ़त जो मूलभूत समाज सुधारक आन्दोलन चलाया और विवेकवादी समाज की स्थापना की दिशा में पहल की, दो दशक पहले कुछ लोगों ने उसे नागपुर में पुनर्जीवित किया. उसमे अगुआ दिवाकर मोहनी और नंदा खरे जैसे कई विचारक थे. शतावधानी नंदा खरे 'आजचा सुधारक' के फिलहाल संपादक हैं और वे नागपुर से इस क्रांति विचार को आगे बढ़ा रहे हैं. इस पत्रिका से अगर मुठ्ठीभर लोग भी प्रेरित हुए होंगे और विवेकवाद की दिशा में कदम बढाए होंगे, तो समझा जाना चाहिए कि संपूर्ण मानव समुदाय को सभ्य ज्ञानवान समाज की नींव पड़ना शुरू हो गया है.

सिनेमा के क्षेत्र में इतना ही गंभीर और रचनात्मक कार्य गोरा गांगुली ने किया. उन्होंने नागपुर को सिने माध्यम की बहुआयामी हकीकत से रूबरू करवाया और यहाँ ऐसा सिने समाज पैदा किया, जो उसे मनोरंजन से इतर समग्रता में समझता था. इसके लिए वे कभी पॉपुलर और वाणिज्यिक रास्ते पर नहीं गए, पर व्यापक प्रभाव पैदा किया.

बहुत से आन्दोलन और जनसंघर्ष इस मौके पर याद किये जा सकते हैं, पर उन्होंने चेतनाकरी हलचल पैदा नहीं की, जिससे उनका उल्लेख खासतौर पर किया जा सके. कई लोग इससे असहमत हो सकते हैं और उन्हें वह अधिकार है.

कुल मिलकर नागपुर का विकास जैसे जैसे हुआ है, उसका सामाजिक-आर्थिक चरित्र बदला है. लेकिन वहां राजनीतिक चेतना सुप्त है. सामाजिक उद्वेलनकारी गतिविधियों का न तो यहाँ क्रमिक विकास दिखता है और न ही वे अंतर्धाराओं के रूप में नज़र आती हैं. अलग-अलग समय पर बिना किसी अन्तर्सूत्र के वे घटित होती रहती हैं और उनमें सभी वर्ग हिस्सेदारी नहीं करते. जो हलचल जिस सीमा में है, उसके बाहर के लोग पहले उसे ठिठककर जरूर देखते थे. अब न तो उतना शऊर बचा है, न उतनी बेचैनी. संभवतः माध्यम वर्ग का विस्तार और लम्बी आर्थिक छलांग ने सामाजिक-राजनीतिक उद्देश्यों को परास्त कर दिया है.

सुनील सोनी

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी