वक्त मुट्ठी से यों फिसला जा रहा है कि रेत हो. ऐसा भी हो कि हम ही रेतघड़ी की रेत में तब्दील हो गए हों. जब नए सूरज की प्रतीक्षा की सीमारेखा पर खड़े हैं तो कुछ सिरहन, कुछ स्फूर्ति के साथ अहसास हो रहा है, नई सदी/सहस्राब्दि के तीन पड़ाव (अब ग्यारह) दुनिया ने किस तेजी से मापे हैं ! महसूस यह भी होता है कि काल संभवतः गणनाओं में भाग रहा है, प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना होने के बावजूद आदमी भूत-गुफाओं की भूलभुलैयां में वहीं है, जहां सहस्राब्दियां उसे छोड़ आई थीं. सभ्य और नैतिक होने के मुहावरे उसने आत्ममुग्धता में गढ़े हैं, पर जब भी मौका आता है, भ्रम की केंचुल छोड़कर हकीकत में लौट आता है. उस दुनिया में, जहां अस्तित्व तथा सत्ता बचाने के लिए वह किसी को बख्शता नहीं. ग्रेगोरियन कैलेंडर में पहले दिन से ३६५वें दिन तक कितने वर्ष इसके गवाह हैं. दो हजार तीन भी.
जब साल का आखिरी दिन बीतने में कुछ ही घंटे शेष हैं, पीछे पलटकर देखता हूँ. ठिठक जाता हूँ... कितनी बदसूरत हो चली है धरती. कितने जख्म लगे हैं, कितने बदरंग दाग; तमाम सौंदर्य यों बिखरा है कि कुरूपता उसका हिस्सा हडपने लगी है. सचमुच ! सभ्य होने के दंभ भरने वाला आदमी इतिहास को कितने बार दोहराता है. युद्ध बार-बार इतिहास के कैदखाने से निकल आता है, डराता है और मासूमियत के मुखौटों से क्रूरता छन-छनकर बाहर आने लगती हैं. बेच-खरीद के जुमले से दुनिया भर को मूर्ख बनाने वाला चतुर बाजार मानवीय रिश्तों को व्यापार बनाते चलता है. अफसोस ! यह अकेले आदमी के हिस्से में है. वही दुनिया में निर्णायक स्थिति में है. उनमें से भी कुछ सब-कुछ संचालित करने की ताकत रखते हैं. वे सत्ता-समीकरण तय करते हैं; मोहरे और वजीर रचते हैं; भव्य बाजार का मायाजाल बुनते हैं और दिव्यता के उन्माद के साथ छलते हैं; हथियार बनाते हैं/बेचते हैं, दवा के कारखाने लगाते हैं, बेचकर दुआएं भी पाते हैं.
वे समय भी तय करने लगे हैं यानी रेत हमारी मुट्ठी से फिसलकर उनकी हथेली में गिर रही है. वक्त ने हमारे पैरों के नीचे से जमीन खींच ली है और अंधकूप में बेतरह गिरते हुए दो हजार तीन बारह महीनों के तीन सौ पैंसठ दिन/रात में बँटकर यों गुजरा कि दो हजार चार ठोस पर शीशे की तरह साफ अस्तित्व के साथ हमारे बस ठीक सामने है.
नववर्ष कैसे मनेगा, कौन मनवाएगा और कौन मना पाएगा? की बहसों में न उलझते हुए भी यह पूछना जरूरी है कि क्यों हम एक ऐसी दुनिया के ‘यूटोपिया’ को अपने व्यक्तिगत कल्पना-संसार से अलग पाते हैं, जिसमें सब सुखी और खूबसूरत हों? क्यों हमारे रिश्तों में वह दोस्त/साथी/पड़ोसी उतने ही मजबूत बंध से बँधा नहीं होता? जितना हमारा ‘परिवार’. क्यों ‘मेरी साड़ी से उसकी साड़ी सफेद’ जैसे सस्ते विज्ञापन हमारी जिदगी का हिस्सा बनने लगते है? क्यों जीवन की धुरी सहअस्तित्व के बजाय स्वअस्तित्व के केंद्रक पर टिक गई है? क्या यह महसूस बिल्कुल नहीं होता कि अच्छी दुनिया के लिए सभी लोगों की बेहतरी के अलावा कोई उपाय नहीं है? स्वाभाविक है, यह सवाल तो उठेगा ही कि अच्छी दुनिया और सुखी लोगों से क्या मतलब है और कैसे यह हो सकता है? कल्पना की उड़ान का विस्तार यथार्थ तक कैसे होगा? लेकिन, यह मुमकिन है. बस ! दूसरों के लिए भी उतनी ही जगह छोड़नी होगी, जितनी हमने अपने लिए तय की है; यह देखते हुए कि कोई बचा न रह जाए. सहस्राब्दि ने दिखाया है कि बाजार कल्पनाओं के रोमांच को सच की सीमाओं में बाँध लाता है. वह इच्छाशक्ति ही कुछ कर पाएगी. बस, उद्देश्य ‘साझा दुनिया-बेहतर दुनिया’ हो.
अतीत हो रहे साल के जख्म इतने हरे हैं कि कुरेदने की जरूरत नहीं. पलक झपकती है तो तस्वीर खिंच जाती है... कैमरे की स्मृति में ‘शटर’ गिरने-उठने की तरह. तेल के मार्फत अर्थव्यवस्था पर कब्जे की हवस में सिन्धुघाटी सभ्यता के बराबर दुनिया की सबसे पुरानी मैसोपोटामिया की सभ्यता को अमेरिकी-ब्रितानी बमों से जमींदोज होते देखा है और उतने ही पुराने बाम को प्रकृति के कहर से. दो साहसी बहनों को चिकित्सा विज्ञान का ‘गिनी पिग’ होते देखा तो आम आदमी की भगवान हो चुकीं मदर टेरेसा को धर्म के ठेकेदारों के हाथों ‘धन्य’ होने का खेल भी; राजनीति-नौकरशाही-अपराध जगत के सबसे बड़े गठजोड़ ‘तेलगी कांड’ को देखा तो दलाली की राजनीति के जूदेव-जोगी सिद्धांत भी. मुंबई बमकांड की पुनरावृत्ति से थर्राए भी. कई राज्यों में सत्ता बदलते देखी, मुख्यमंत्रियों का बदलना और ‘फीलगुड फैक्टर’ का दर्शन भी. रुपया चढ़ते देखा और शेयर बाजार भी. बस नहीं देखा तो जन के लिए बने तंत्र को जनता के पक्ष में जाते हुए. वह मरती रही, बेकारी, भुखमरी, गरीबी, आपदा और मानवजनित अन्याय से. भूमंडलीकरण ने नया कल्पनालोक रचा. वहाँ से इत्र की सुगंध जैसा ‘फीलगुड’ फैक्टर निकला. नेता ‘फीलगुड फैक्टर’ को सूंघते रहे, आनंद के समुद्रों में डूबते उतराते रहे. टूटी-फूटी सडकों पर जानदार सस्पेंशनवाली शानदार गाड़ियों से चलते रहे, महंगे होटलों में स्वादिष्ट भोजन से छकते रहे, आलीशान मकानों में ऐशोआराम से भर जाते रहे, छतफाड़ ठहाके लगाते रहे, अफसर जीहुजूरी में सब सुख भोगते रहे. जनता देखती रही. हकीकत में भी, फिल्मों भी. उसकी नियति ही ऐसी थी.
‘नियति’ में निराशा का जो गहन भाव है, वह दो हजार चार के आगम को जरा कष्टकर कर सकता है, पर वक्त का हरेक क्षण बेहतरी के बीज सहेजे होता है. लेकिन, बीज कैसे बोया जाए, अंकुर फूटें, बिरवा से वृक्ष हो जाए; यह सब होगा कैसे? करेगा कौन? राजनेता, नौकरशाही, उद्योगपति, यही व्यवस्था? अमेरिका में भी आम चुनाव हैं; बुश को लडना है. भारत में भी आम चुनाव हैं. अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी को लडना है. देश का आधा साल चुनाव में जाना है. छोटे नेता-कार्यकर्ता से लेकर बडे नेता-कार्यकर्ता तक सब व्यस्त रहेंगे. बुश के पास सद्दाम का ‘फंडा’ है, अटल के पास ‘फीलगुड फैक्टर’ का. नकारने के बावजूद दोनों दो ध्रुवों के नेता हैं और दोनों कई दलों के गठबंधन का नेतृत्व करेंगे. जीते जो, देश में आगे ‘साझा सत्ता’ की राजनीति चलेगी.
लेकिन, सत्ता में काबिज होने की इस राजनीति में दुनिया के लिए कोई जगह नहीं है. पिचानवें फीसदी लोगों के लिए भाग्यविधाता बन बैठे राजनीतिक जो चाहेंगे होगा. वे वही करेंगे, जो बहुराष्ट*ीय कंपनियां कहेंगी. ये कंपनियां वही कहेंगी, जो दुनिया का अधिकतम मुनाफा छानकर उनके पास पहुँचा दे. सहस्राब्दि के चौथे पडाव के अंत में भी यही लिखा जाएगा, जो अभी लिखा जा रहा है, अगर हमने कुछ न किया. सिर्फ युद्धभूमि बदलेगी, करेंसी और तकनीक बदलेगी.
नया साल इतिहास को किताबों में दफन कर देने का सुनहरा मौका हो सकता है. थोड़ी-सी कोशिश कीजिए; हाथ बढ़ाइए और थाम लीजिए वक्त को.
लोकमत समाचार में मैंने ये सम्पादकीय २००३ की ३१ दिसंबर को लिखा था. पहले सोचा था कि पहली जनवरी २०११ को पोस्ट करूँगा, पर नहीं कर पाया. अब कर रहा हूँ, क्योंकि ये अब भी मौजूं है.
Hi Bhaiya!
जवाब देंहटाएंThank you for your articles.
It was actually not known to me that you write blogs also.
All are very interesting and inspirational posts........
Keep working on..............