समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
गुरुवार, 25 जून 2009
विदर्भ के किसानों की अधूरी बात
विदर्भ के किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति क्यों पनपी? कोई शक नहीं कि यह बड़ा सवाल है। जो लोग विदर्भ को नहीं जनता वे अक्सर ये सवाल करते हैं कि उत्तरभारत में तो इतनी गरीबी है। वहां किसान आत्महत्या क्यों नहीं करते? ये सवाल करने वाले नहीं जानते कि दोनों जगह के जीवनस्तर में बहुत फर्क रहा है। संतरे और कपास जैसी फसलों ने विदर्भ के किसानों का जीवन सम्पन्नता से भर दिया था। यहाँ नदी नहीं हैं. पानी और सिंचाई सुविधा बहुत कम है। इसलिए कम पानी वाली पर दोनों नकदी फसलों ने किसानों के जीवनस्तर को काफी ऊंचा उठा दिया। पानी की व्यवस्था करने के लिए लोगों ने तालाब जैसे जलस्रोत को जीवन का हिस्सा बना लिया। लेकिन पिछले पॉँच दशकों में इन जलस्रोतों की काफी उपेक्षा हुई और उनमें से अधिकतर समाप्त हो गए। इसके जिम्मेदार आज़ादी के बाद की पीढ़ी रही। उसने इन जलस्रोतों को बचाने का संदेश आगे तक नहीं पहुँचाया। यही नहीं इस पीढ़ी ने वैकल्पिक फसलों को बनाये रखने के संदेश को भी आगे नहीं पहुँचाया। नतीजा ये हुआ कि जलस्रोत तो समाप्त हुए ही, नकदी फसलों के लोभ में खाद्यान्न की व्यवस्था भी समाप्त हो गयी। इसने विदर्भ को सबसे बदतरीन संकट में ला दिया। विदर्भ के अधिसंख्य किसान बाज़ार से अनाज खरीदकर खाने लगे. विपदा या आपदा के वक्त किसानों के पास बीज के लिए रखा खाद्यान्न भी नहीं रहा। प्रकृति की लगातार मार ने किसानों के सिर पर भारी बोझ लाद दिया। इसके बाद वे इस संकट का हल ढूंढने में विफल रहे। निराशा इतनी बढ़ी कि आत्महत्या की प्रवृत्ति हावी हो गई।
लेकिन ये सिर्फ़ एक कारण है। असल में जैसे जैसे विदर्भ के गाँव पहले कस्बों और फिर शहरों में तब्दील होते गए, किसान दरकिनार होते गए। अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका कम होती चली गयी और उसकी जगह वेतनभोगी वर्ग के पैसे ने ले ली। पहले हर गाँव के साप्ताहिक बाज़ार में भीड़ से चीजों की कीमतें तय होती थीं। अगर किसान बड़े पैमाने पर बाज़ार आयें और खरीदी करें तो व्यापारी समझ जाता था की फसल अच्छी हुई है. यानी बाज़ार में पैसा अच्छा आयेगा. इससे तुंरत कीम्तीं बढ़ जाती थीं. लेकिन कम भीड़ रही तो कीमतें तुंरत उतर जाती थी। अब ये जगह वेतनभोगी वर्ग के पास आने वाले पैसे ने ले ली। कीमतें वही तय करने लगा, क्योंकि ये वर्ग एक बड़े तबके को रोजगार भी देता था । जैसे की प्लम्बर, इलेक्ट्रिशन, घरेलू नौकर, पानवाला, खोमचेवाला, sabjiwala आदि... इससे किसान का खर्च बढ़ गया। साथ ही उसकी उत्पादन लागत उत्तरोत्तर बढ़ती चली गई। इसकी तुलना में नकदी फसलों की कीमतें नहीं बढ़ीं । इसी वर्ग ने किसान की खान-पीन की आदतें भी बदल दीं. विटामिन-प्रोटीन से भरपूर ज्वार-बाजरा और मोटे अन्न की जगह उन्होंने अच्छा गेहूं-चावल खरीद कर खाना शुरू कर दिया. सब्जी भी शहरों को भेजी जाने लगी तो उसे भी खरीदना पड़ने लगा. नतीजे में विदर्भ के किसान की आर्थिक स्थिति और ख़राब होते चली गई। आर्थिक उदारीकरण के बाद जब शहरी मध्य वर्ग बढ़ गया तो किसान और वेतनभोगी वर्ग की आमदनी में जमीन आसमान का फर्क हो गया. इस पर असली मार तब पड़ी, जब पांचवा वेतन आयोग आया और जीवनोपयोगी चीजों के दाम आशातीत बढ़ गए। तिस पर फसल लगातार खराब होने लगी। किसानों की आत्महत्या का दौर यहीं से शुरू हुआ।
अब छठे वेतन आयोग के साथ राहत पैकेज आ गए। लेकिन महंगाई आसमान पर है। बारिश नहीं हुई तो किसान तबाह हो जायेंगे। उनके पास फिर आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा।
किसानों ने इस विपदा से निपटने के लिए सोयाबीन को विकल्प के रूप में चुना है। लेकिन वह भी नकदी फसल है। वह खाद्यान्न भी नहीं है। खाद और पानी वक्त पर मांगती है। कीटनाशक भी चाहिए। लेकिन नई बीमारी ने विदर्भ के कुछ हिस्सों में ये फसल पिछले साल तबाह की ही है.
मैं मानता हूँ की किसानों को इस विपदा से निकलने के लिए बहुफसली पैटर्न अपनाने की जरूरत है. वे दाल, ज्वार-बाजरा समेत मोटा अन्न भी उगायें और उन्हें खाना भी सीखें। ये कम खाद, कीटनाशक, पानी, जगह मांगते हैं. भोजन का भी पर्याय हैं. यही असली हल है.
सुनील सोनी
नागपुर
२५/०६/2009
विदर्भ के किसानों का क्या होगा?
फिर वही रात है...
विदर्भ में किसानों के आत्महत्या करने की दर में कमी आयी है। केन्द्र सरकार के दो और राज्य सरकार के दो यानी कुल चार पैकेज के बाद कुछ बदलाव सम्भव हुआ है। राहत पैकेज से कितनी राहत मिली, ये अलग बात हो सकती है। लेकिन ये तय है की किसानों को नया क़र्ज़ मिलने का आश्वासन जरूर मिल गया। यही सबसे बड़ी राहत की बात थी। पिछले कई (कम से कम पॉँच सालों से) किसान प्रकृति जन्य विपदा झेल रहे हैं। लगता है ये सिलसिला इस साल भी जारी रहेगा। मानसून अब तक विदर्भ तक नहीं पहुँचा है। किसान बुआई के लिए पानी बरसने की राह देख रहे हैं। बस अच्छा ये है की उन्होंने समझदारी दिखाते हुए अब तक बुआई नहीं की है। ये पिछले पॉँच सालों में मिली सीख है। दरअसल पहली बारिश आते ही किसान बुआई कर देते थे। नतीजा ये होता था कि दूसरी फुहार पखवाड़े या महीने भर बाद आती थी। इससे बीज ख़राब हो जाता था। बड़ी मुश्किल से किसान क़र्ज़ जुटाकर एक बार बीज लेता था। दूसरी या तीसरी बार बुआई के लिए उसे फिर से क़र्ज़ लेना पड़ता था। पहली बार बैंक अल्पावधि क़र्ज़ दे देते हैं, पर दुबारा नहीं देते। नतीजतन किसान को साहूकार के सामने हाथ फैलाना पड़ता। साहूकार १० से ३० रुपये सैकड़ा की दर पर क़र्ज़ देते हैं। फसल अच्छी भी आती तो उसे चुकाते चुकाते किसान की कमर टूट जाती है, क्योंकि महीने भर बाद ब्याज पर ब्याज यानी चक्रवृधि ब्याज चुकाना पड़ता है। फसल जब तक आती, ब्याज मूलधन से दुगुना हो जाता। फिर तिगुना, चौगुना, पंचगुना... ये क़र्ज़ ख़तम न होने का सिलसिला अनंत चलता रहता। अब तक विदर्भ के किसान ये ही झेल रहे थे। महाराष्ट्र सरकार ने जब साहूकारों का ब्याज न भरने को कहा और साहूकारों को जेल में डालने की कार्रवाई की, तब भी किसान ताकतवर साहूकारों से लड़ाई मोल नहीं ले सकता था। कारण साफ़ था, क्योंकि पूरे देश की तरह प्रशासन और पुलिस यहाँ भी ताकतवरों यानी साहूकारों के साथ थी। खासकर तब जब सांसद (यवतमाल का मामला) ही साहूकार हो। दिखावे की कार्रवाई के बाद भुगतना तो आखिरकार किसानों को ही था। सो उन्होंने जल में रहते हुए मगरमच्छa से बैर नहीं लिया। सिर्फ़ कुछ अपवाद छोड़ दें तो। बैंक का क़र्ज़ खाता साफ़ होने से ही उन्होंने राहत की साँस ली.
अब एक बार फिर किसान के सामने संकट है। उसने बुआई नहीं की है, क्योंकि बरसात हरबार धोखा दे जाती है। लेकिन बरसात हुई ही नहीं तो क्या होगा। इसके बावजूद कि हर बार मौसम विभाग भविष्यवाणी करता है, किसानों ने बड़ी चोट खाई है। इस बार भी वे ९९% सामान्य बारिश कि भविष्यवाणी कर रहे हैं। क्या होगा अगर बारिश हुई ही नहीं। सरकार की नज़र में बड़े यानी ५ एकड़ से अधिक जोत या खेत वाले किसानों ने जो पैसा बीज में दल दिया है, वह उन्हें वनटाइम सेटलमेंट के टहल ३० जून तक बैंक को चुकाना था। अगर अब तक बारिश अच्छी हो जाती तो वे साहूकार से पैसा लेकर बैंक को दे देते और फसल आने पर साहूकार को। इससे बैंक का खाता भी साफ़ हो जाता और कुछ पैसा हाथ में भी बच जाता। लेकिन बरसात के न आने से ये गणित बिगड़ गया है। अब बैंक ने अल्टीमेटम दे दिया है। अगर ३० जून तक नहीं भरा तो क़र्ज़ खाता वैसा ही रह जाएगा। यानी सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा। किसानों के भी, सरकार के भी। फिर नए राहत पैकेज की जरूरत पड़ेगी। छोटे किसानों की हालत और बुरी है. क्योंकि अगली फसल न निकली तो वे फिर ज़हर की दुकान, कुएं अथवा फांसी लगाने का रुख करेंगे। सरकार को अब सबसे पहला काम बैंकों को वसूली की तारीख सालभर टालने को कहना चाहिए।
शेष नई पोस्ट में...
सुनील सोनी
नागपुर
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