समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
गुरुवार, 25 जून 2009
विदर्भ के किसानों का क्या होगा?
फिर वही रात है...
विदर्भ में किसानों के आत्महत्या करने की दर में कमी आयी है। केन्द्र सरकार के दो और राज्य सरकार के दो यानी कुल चार पैकेज के बाद कुछ बदलाव सम्भव हुआ है। राहत पैकेज से कितनी राहत मिली, ये अलग बात हो सकती है। लेकिन ये तय है की किसानों को नया क़र्ज़ मिलने का आश्वासन जरूर मिल गया। यही सबसे बड़ी राहत की बात थी। पिछले कई (कम से कम पॉँच सालों से) किसान प्रकृति जन्य विपदा झेल रहे हैं। लगता है ये सिलसिला इस साल भी जारी रहेगा। मानसून अब तक विदर्भ तक नहीं पहुँचा है। किसान बुआई के लिए पानी बरसने की राह देख रहे हैं। बस अच्छा ये है की उन्होंने समझदारी दिखाते हुए अब तक बुआई नहीं की है। ये पिछले पॉँच सालों में मिली सीख है। दरअसल पहली बारिश आते ही किसान बुआई कर देते थे। नतीजा ये होता था कि दूसरी फुहार पखवाड़े या महीने भर बाद आती थी। इससे बीज ख़राब हो जाता था। बड़ी मुश्किल से किसान क़र्ज़ जुटाकर एक बार बीज लेता था। दूसरी या तीसरी बार बुआई के लिए उसे फिर से क़र्ज़ लेना पड़ता था। पहली बार बैंक अल्पावधि क़र्ज़ दे देते हैं, पर दुबारा नहीं देते। नतीजतन किसान को साहूकार के सामने हाथ फैलाना पड़ता। साहूकार १० से ३० रुपये सैकड़ा की दर पर क़र्ज़ देते हैं। फसल अच्छी भी आती तो उसे चुकाते चुकाते किसान की कमर टूट जाती है, क्योंकि महीने भर बाद ब्याज पर ब्याज यानी चक्रवृधि ब्याज चुकाना पड़ता है। फसल जब तक आती, ब्याज मूलधन से दुगुना हो जाता। फिर तिगुना, चौगुना, पंचगुना... ये क़र्ज़ ख़तम न होने का सिलसिला अनंत चलता रहता। अब तक विदर्भ के किसान ये ही झेल रहे थे। महाराष्ट्र सरकार ने जब साहूकारों का ब्याज न भरने को कहा और साहूकारों को जेल में डालने की कार्रवाई की, तब भी किसान ताकतवर साहूकारों से लड़ाई मोल नहीं ले सकता था। कारण साफ़ था, क्योंकि पूरे देश की तरह प्रशासन और पुलिस यहाँ भी ताकतवरों यानी साहूकारों के साथ थी। खासकर तब जब सांसद (यवतमाल का मामला) ही साहूकार हो। दिखावे की कार्रवाई के बाद भुगतना तो आखिरकार किसानों को ही था। सो उन्होंने जल में रहते हुए मगरमच्छa से बैर नहीं लिया। सिर्फ़ कुछ अपवाद छोड़ दें तो। बैंक का क़र्ज़ खाता साफ़ होने से ही उन्होंने राहत की साँस ली.
अब एक बार फिर किसान के सामने संकट है। उसने बुआई नहीं की है, क्योंकि बरसात हरबार धोखा दे जाती है। लेकिन बरसात हुई ही नहीं तो क्या होगा। इसके बावजूद कि हर बार मौसम विभाग भविष्यवाणी करता है, किसानों ने बड़ी चोट खाई है। इस बार भी वे ९९% सामान्य बारिश कि भविष्यवाणी कर रहे हैं। क्या होगा अगर बारिश हुई ही नहीं। सरकार की नज़र में बड़े यानी ५ एकड़ से अधिक जोत या खेत वाले किसानों ने जो पैसा बीज में दल दिया है, वह उन्हें वनटाइम सेटलमेंट के टहल ३० जून तक बैंक को चुकाना था। अगर अब तक बारिश अच्छी हो जाती तो वे साहूकार से पैसा लेकर बैंक को दे देते और फसल आने पर साहूकार को। इससे बैंक का खाता भी साफ़ हो जाता और कुछ पैसा हाथ में भी बच जाता। लेकिन बरसात के न आने से ये गणित बिगड़ गया है। अब बैंक ने अल्टीमेटम दे दिया है। अगर ३० जून तक नहीं भरा तो क़र्ज़ खाता वैसा ही रह जाएगा। यानी सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा। किसानों के भी, सरकार के भी। फिर नए राहत पैकेज की जरूरत पड़ेगी। छोटे किसानों की हालत और बुरी है. क्योंकि अगली फसल न निकली तो वे फिर ज़हर की दुकान, कुएं अथवा फांसी लगाने का रुख करेंगे। सरकार को अब सबसे पहला काम बैंकों को वसूली की तारीख सालभर टालने को कहना चाहिए।
शेष नई पोस्ट में...
सुनील सोनी
नागपुर
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