सोमवार, 4 जनवरी 2021

यूँ

 तकिये के नीचे किताब रखकर सो गए

आँसुओं से भीगा गुलाब फिर यूँ खिल गया


बारिशों की याद में ख्वाब तेरा छू गए

रात हुई तमाम तो किस्सा कोई यूँ खिल गया


हर गली चाँद निकला हम कहीं खो गए

उलझनें सुलझाईं तो चेहरा तेरा यूँ खिल गया


©सुनील_सोनी

उल्फ़त

 उसने कहा, ये तुम्हारी सबसे बुरी लत है

मैंने कहा, अपनी लतों में एक और जोड़ लो


©सुनील_सोनी

एहसास

 एक्शन फिल्में देखते हुए तीव्र इच्छा होती है

किरदारों की आंखों में प्रेम उपजते हुए देखना


हिंसा के नृशंस क्षणों में लज्जा से रुक जाना

करुणा से भर आना और घृणा का ढह जाना


©सुनील_सोनी



ताक़त

 ग़ुलामी की बू न जाएगी जब तक

बग़ावत नौजवां ख़ूँ से न जाएगी

©सुनील_सोनी

हाँ

 यूँ घूमना बेइरादा, ठहर जाना फिर लौट जाना

बहुत मुश्किल है दिलजलों का फिर लौट पाना


हरगिज़ नहीं है मुमकिन तनहा सफ़र पे जाना

याद की रात के भरोसे हर रोज़ जीते जाना

©सुनील_सोनी

वीराना (ग़ज़ल)

 सन्नाटों में दिल के वीराना भी जुड़ गया

याद का धुआँ उठा औ आँखों से बह गया


दोस्तो के हाथ में ही था ज़िम्मा चिराग का

ज़माना मुड़ा तो वफ़ा का ख्वाब बह गया


ज़ुल्मत से आरज़ू क्या किसी ने की होगी

मेरे वक़्त ए आफ़ताब का किस्सा सो गया


साँसों का भरम जोर का झोंका ले गया

हासिल कुल जमा ख़्वाब तनहा रह गया

 

©सुनील_सोनी


दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी