हुस्न ओ दानिश के अमल को समझ लें
लैला में कैस ने जो जाना वो क्या अलग था
©सुनील_सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
तकिये के नीचे किताब रखकर सो गए
आँसुओं से भीगा गुलाब फिर यूँ खिल गया
बारिशों की याद में ख्वाब तेरा छू गए
रात हुई तमाम तो किस्सा कोई यूँ खिल गया
हर गली चाँद निकला हम कहीं खो गए
उलझनें सुलझाईं तो चेहरा तेरा यूँ खिल गया
©सुनील_सोनी
एक्शन फिल्में देखते हुए तीव्र इच्छा होती है
किरदारों की आंखों में प्रेम उपजते हुए देखना
हिंसा के नृशंस क्षणों में लज्जा से रुक जाना
करुणा से भर आना और घृणा का ढह जाना
©सुनील_सोनी
यूँ घूमना बेइरादा, ठहर जाना फिर लौट जाना
बहुत मुश्किल है दिलजलों का फिर लौट पाना
हरगिज़ नहीं है मुमकिन तनहा सफ़र पे जाना
याद की रात के भरोसे हर रोज़ जीते जाना
©सुनील_सोनी
सन्नाटों में दिल के वीराना भी जुड़ गया
याद का धुआँ उठा औ आँखों से बह गया
दोस्तो के हाथ में ही था ज़िम्मा चिराग का
ज़माना मुड़ा तो वफ़ा का ख्वाब बह गया
ज़ुल्मत से आरज़ू क्या किसी ने की होगी
मेरे वक़्त ए आफ़ताब का किस्सा सो गया
साँसों का भरम जोर का झोंका ले गया
हासिल कुल जमा ख़्वाब तनहा रह गया
©सुनील_सोनी
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी