सोमवार, 9 मई 2016

राज ने समाज से पानी छीना

मौजूदा दौर में जब हर ओर पानी का संकट है, बहुत से लोगों ने इसे पहले भांप लिया था. अनुपम मिश्र भी उन्हीं में से एक हैं. वे कई दशकों से समाज और राजनीतिज्ञों को इस बारे में चेता रहे हैं.  12 साल पहले उनकी बातें कितनी सटीक निकलीं, देखिये ये इंटरव्यू :

‘राज ने समाज के हाथ से पानी छीना’



अनुपम मिश्र देश के एक प्रमुख गांधीवादी कार्यकर्ता हैं और पानी पर बहुत चिंता के साथ काम कर रहे हैं. उनकी किताबें ‘राजस्थान की रजत बूँदे’ और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में उनकी चिंता और काम की गहराई, दोनों नजर आते हैं. वे दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान के प्रमुख
हैं. उनकी दूसरी पहचान हिन्दी  के शीर्षस्थ कवि भवानी प्रसाद मिश्र का पुत्र होना है. जाहिर है, समाज और प्रकृति की चिंता उन्हें विरासत में मिली है. उनका कहना है कि पानी का प्रबंधन समाज को ही सौंप देना चाहिए. राजकर्ताओं को यह समझना चाहिए कि सदियों पुरानी इस सभ्यता में आम आदमी पानी का बेहतरीन इस्तेमाल करता रहा है.

जुलाई, 2004  में वे नागपुर आए तो सर्वोदय आश्रम में एक स्लाइड शो के साथ ‘राज, समाज और पानी’ के मुद्दे पर व्याख्यान दिया. वहीं उनसे कुछ मुद्दों पर मेरी चर्चा हुई. पढ़िए  :



सवाल  : अनुपमजी; पानी को लेकर इन दिनों जिस तरह से हौआ खड़ा किया गया है. संयुक्त राष्ट्र की तमाम एजेंसियों से लेकर उद्योगपति और सरकारें बड़ी चिंतित दिखती हैं. पानी के लिए युद्ध तक की बातें होती हैं? कहीं ऐसा नहीं लगता कि यह हौआ कुछ ताकतवर लोगों को फायदा पहुँचाने की साजिश का हिस्सा है? उसकी मानसिक तैयारी करवाई जा रही है?

जवाब : देखिए, मैं इसे सीधे साजिश के रूप में नहीं देखता. इसे ऐसा देखा जाना चाहिए कि भूमंडलीकरण और निजीकरण के इस दौर में हर चीज का निजीकरण हो रहा है. यह दरअसल निजीकरण का झंडा है. इसमें पानी एक मुद्दा है. बाकी में जमीन है, जंगल है और समूचे प्राकृतिक संसाधन हैं. हर चीज का निजीकरण करने की मुहिम है. यहां तक कि सरकारों का निजीकरण होने जा रहा है. जहां तक युद्ध वाली बात है तो व्यापक संदर्भ में तो नहीं, पर देखिए कि घर-घर में पानी को लेकर झगड़ा है. भाई-भाई लड़ रहे हैं. यानी खतरा तो है. लेकिन, यह खतरा पानी की कमी की वजह से नहीं है. दरअसल, पानी का जिस बदतमीजी से उपयोग हो रहा है, वह इस खतरे का कारण है. फसलों में ज्यादा पानी लगने लगा है, घर बड़े होने लगे हैं और उनमें हरेक सदस्य के लिए टॉयलेट है. बरअक्स इसके, जमीन के पानी को बनाए रखने का कोई प्रयास नहीं है. शहरी लोगों को धूल से नफरत होने लगी है. वे सड़कों को सीमेंट-कांक्रीट की बना रहे हैं. कोई जगह नहीं छोड़ते, जहां से धूल उड़े. पानी जमीन में जाएगा कैसे? तो यह सब सहजता से हो रहा है. यानी कोई षड्यंत्र नहीं है. लेकिन, खतरा कितना बड़ा है, इसे देखिए. मुगल बादशाह अकबर को उसकी राजधानी फतेहपुर सीकरी को इंजीनियरों के तमाम प्रयासों के बावजूद 16 साल बाद खाली करना पड़ा. सिर्फ पानी की वजह से. जो संपन्न शहर हैं, वे पानी खींचकर ले आते हैं. यमुना और गंगा से दिल्ली तक पानी पहुँचाते हैं. लेकिन, और पानी चाहिए.

सवाल  : एक मुद्दा यह भी है कि जो आप कहते हैं कि समाज को पानी का प्रबंधन और अधिकार सौंप देना चाहिए तो जो राष्ट्रीय संपत्ति  है, उसका क्या होगा? क्या यह सरकार जो लोगों ने चुनी है, वह कोई निजीपन का बोध करवा रही है?
जवाब : पानी का काम अब तक समाज करता रहा है. सिर्फ डेढ़ सौ साल पहले यानी अंग्रेजों के आने के बाद यह हुआ कि पानी का प्रबंधन समाज के हाथों से छीन लिया गया. अब तक समाज के हाथ में ही पानी रहा है. राज ने न केवल समाज के हाथ से पानी छीना, बल्कि वह यह भूल गया कि लोग ही उसका सबसे अच्छा इस्तेमाल और प्रबंधन करते रहे हैं. राज ने समाज को माना ही नहीं और योजनाएं बनाकर काम करता रहा. जबकि अंग्रेजों ने भी रुड़की में स्थानीय लोगों से अपर गंगा नहर बनवाई थी और वैसी इंजीनियरिंग कोई तकनीशियन नहीं कर सकता. तो सरकार जब निकम्मी हो तो लोगों को उसका उपाय निजीकरण में नजर आने लगता है. समाज का मुखर और ताकतवर वर्ग उसका समर्थन कर देता है. हर पार्टी की राय वही हो जाती है.

सवाल  : जल नीति और नदी जोड़ो परियोजना क्या समाज को बेदखल नहीं करेंगे?

जवाब : जल नीति हो या और कोई नीति, विशुद्ध अनीति का दौर है. समाज के पोषण की चीजें नहीं रह गई हैं. नदी जोड़ो परियोजना तो अव्यावहारिक है. हालांकि, उसके लिए पैसा ही नहीं जुट पाएगा, पर चिंता की बात यह है कि उसके लिए सभी राजनीतिक दल, राष्ट्रपति-पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री-पूर्व प्रधानमंत्री; सभी एक हो जाते हैं. साफ है कि प्रकृति नदियों को जोड़ती भी है और तोड़ती भी है. करोड़ों साल लगते हैं. गंगा-जमुना जहां से निकलती हैं, वहां से अलग हो जाती हैं. प्रकृति उन्हें इलाहाबाद में मिलाती है और लोग उसे तीर्थ बनाते हैं. अब इंजीनियरिंग से जोड़ेंगे तो सिर्फ नहरें बनेंगी और विनाश अलग होगा.

सवाल  : अलवर में राजेन्द्र सिंह या नागपुर के पास वलनी जैसे प्रयोगों को क्या कहेंगे? क्या यही माध्यम हैं?
जवाब : राजेन्द्र सिंह और वलनी के प्रयोग तो आशा की किरणों हैं. ये समाज को उसकी प्रतिष्ठा वापस दिलाएंगे. मैं तो कहता हूँ कि सरकारी विभागों को खत्म करो और ऐसे प्रयोगों को मान्यता दो. राजेन्द्र सिंह के प्रयोग 24 कैरेट के हैं. हर साल बिन बुलाए तकरीबन 35 हजार लोग उसे देखने आते हैं. सात साल से सूखा है, पर खेत लहलहा रहे हैं. जाकर देखिए.

सवाल : क्या ऐसा नहीं है कि केवल पानी की चिंता बाकी सवालों से दूर करती है?
जवाब  : नहीं; ऐसा नहीं है. इन्हें पूरक के रूप में देखना चाहिए. आखिर समाज के लिए कई स्तंभ होते हैं. अलवर के गरीबों में संपन्नता यही प्रयोग ले आए हैं.

सवाल : एनजीओ की भूमिका को लेकर आश्वस्त हैं?
जवाब  : जो काम कोषोन्मुख होगा, उसका हाल यही होगा. बीस साल पहले यूनिसेफ के पैसे से उन्हीं लोगों ने लाखों हैंडपम्प खुदवाए, जिन्हें अब जाकर तालाब, वाटरशेड नजर आ रहे हैं. उनके प्रति समाज की श्रद्धा नहीं है. वे समाज और पंचायत से सीखने के बजाय उन्हें सिखाने में लगे हैं. जबकि पंचायत 2000 साल पुरानी संस्था है.

सवाल : क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि समाज अपने हक के प्रति चिंतित नहीं रहा?
जवाब : दरअसल, जिस तरह से मजदूरों को कुशल नहीं माना गया और उन्हें मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया गया उसने स्थितियां खराब की. कोई गाँव लौटकर तालाब की ओर नहीं देखता. उसे निकृष्ट काम बना दिया गया है.


शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

औजार

सियासी हलकों में तूफान के किस्से आजकल आम हैं. भगवा अश्वमेध को चुनौती देते साहित्यकार, इतिहासकार, फिल्मकार त्यागपत्रों से शरसंधान में जुटे हैं. विज्ञानवेत्ता देर से सही, इस औजार को अपनाने लगे हैं.


निशाने सटीक हैं. प्रतिरोध के स्वर काम कर रहे हैं और स्वाभाविक ढंग से प्रतिक्रियाएं तीखेपन से भद्देपन और अश्लीलता की ओर बढ़ रही हैं. प्रतिक्रियावादियों को जाननेवाले इसे पुराना ढर्रा ही कहेंगे. भारत में 2014 में जन्मे भगवा सियासी उभार की पृष्ठभूमि में यह अवश्यंभावी डर सच में तब्दील होने की प्रक्रिया में है कि संस्थानों और संगठनों को वैचारिक कत्लगाहों में तब्दील करके दक्षिणपंथी राह ही खुली रखी जाएगी.

विहंग दृष्टि से निरपेक्ष कुछ होता हो, तो यूं समझ बनती है कि भारत और भारतीयता के प्रगतिशील बौद्धिक उध्र्वगमन से निश्चिंत ऊंघते हरकारे अनमने से उठ बैठे हैं. निश्चय ही समक्ष दिशादुर्गम्य रण विशाल है. सो, चिड़चिड़ाहट में सहीं, बिना रणनीति यह लक्ष्य साधा है. सवाल उठेगा ही कि अगला कदम क्या होगा? कैसे सधेगा और किसलिए?








हत्यारे निकल पड़े हैं मांदों से

भूख बहुत ज्यादा है

और तुम्हारे औजार भी बोथरे हैं

उनके सुनहरे चश्मे भी

अतीत की तरह

भविष्य को

कत्लगाहों में लाने से रोक नहीं सकते

खून बहते-बहते पड़ जाएगा काला

तब चढ़ेगा नया मुलम्मा

तब तक

जब तक

भविष्य भी हो

अतीत जैसा सुनहरा

रविवार, 5 अगस्त 2012

मर्लिन मुनरो

मर्लिन की गाथा

मर्लिन  मुनरो  की मृत्यु के ६० साल पूरे होने पर...



ह अकथ कथा है, ऐसी उदास परी की, जो जिंदगी भर उस चीज के लिए पहचानी गई, जो उसे असह्य थी..
वो मोह लेने का मशहूर हुनर 

‘दि सेवेन इयर च’ में वो मशहूर ‘स्कर्ट ब्लो’ वैसे मर्लिन का मिजाज नहीं बताता, जिसकी बातें सबसे ज्यादा होती हैं.
कोई उसकी समंदरी नीली आंखों पर, कोई सुनहरी जुल्फों या रक्ताभ लिपिस्टिक रंगे होठों पर फिदा हो सकता है; और कोई संगमरमरी जिस्म या शोख अदाओं पर दुनिया न्यौछावर कर सकता है..

लेकिन, कौन देखता है कि सफलता के अंधेरे अनंत होते हैं. 9 साल में बलात्कार की यातना, दुकान की नौकरी पर बीता बचपन, 16 की उम्र में खुदकुशी की कोशिश..

बचपन की बदसूरती के चलते खूबसूरती के आग्रह का दु:ख उसके कितने भीतर तक धंसा था, इसका अंदाजा उसी के कथन से लगाइए..

‘‘मैं जब बच्ची थी, तब मुझसे किसी ने कभी नहीं कहा कि मैं सुंदर हूं. तमाम बच्चियों से कहा जाना चाहिए कि वे सुंदर हैं. वे सुंदर न हों तब भी.’’

उदास परी 
असहाय और सहायता के उसके सपने, जिसमें उसने देखा कि वह चर्च में जमीन पर लोट रहे जनसैलाब के सामने निर्वसना खड़ी है.. लोगों के सिर बचाने के लिए पंजों के बल चल रही है.
मर्लिन 1926 में जन्मी. उनकी मां मानसिक रोगी थीं. लिहाजा, ज्यादातर बचपन अनाथाश्रम अथवा दूसरों के घर में बीता.
36 साल की छोटी-सी जिंदगी और बड़ी कामयाबी. 1946 में उसे फिल्मों में काम मिल गया. एक साल के भीतर ही 30 बड़ी फिल्म उसके खाते में थीं.

मॉडलिंग से पहले पॉर्न फिल्म से शुरू हुआ सिलसिला उसे हॉलीवुड में सर्वोच्च शिखर तक ले गया.   वह वहां अकेली और भयभीत थी. सफलता के शिखर पर भी उसका जीवन उतना ही अवास्तविक था जितना एक स्वप्न..

उसे मेकअप, कैमरों और स्टूडियो से घृणा थी, पर उसके बिना वह जी भी नहीं पाती थी..

उसका असली ख्याल यह था..

मर्लिन की एक जानलेवा अदा 
‘‘सेक्स सिम्बल बनना एक वस्तु बन जाना है. मैं वस्तु होने से नफरत करती हूं. लेकिन, मैं सेक्स सिम्बल के बजाय किसी और चीज का सिम्बल बनना चाहती हूं. मैं यकीन करती हूँ कि मैं एक अभिनेत्री बनना चाहती हूं. अपनी इंटीग्रिटी के साथ एक अभिनेत्री . मैं सचमुच एक अदाकारा बनना चाहती हूँ, एक कामोत्तेजक जीव नहीं.’’

1949 में मर्लिन की फिल्म ‘जेंटलमेंस प्रिफर ब्लॉन्ड्स’ में जो गीत है, ‘डायमंड्स आर अ गल्र्स बेस्ट फ्रेंड्स’; वह उसकी जिंदगी पर खरा उतरता है. वह अपने लिए जिंदगी भर डायमंड्स इकट्ठे करती रही, ताकि पुरुषों के खोखले समाज में उसे इज्जत मिल जाए, पर वो उसे मिला नहीं.
इसलिए उसने कभी जो कहा था..
‘‘हॉलीवुड में किसी भी लड़की की प्रतिभा इस बात से आंकी जाती है कि वह कैसी दिख रही हैं, इस पर नहीं कि वह असल में हैं क्या. हॉलीवुड ऐसी जगह है, जहाँ आपको चुंबन के लिए हजार डॉलर्स मिल जाएंगे. लेकिन, आत्मा के लिए 50 सेंट्स भी नहीं. मैं यह जानती हूं और मैं महंगा ऑफर ठुकरा देती हूँ और 50 सेंट्स मंजूर कर लेती हूँ.’’


...पर प्रेम कहां था?

बेसबॉल स्टार जो डिमैगियो और नाटककार ऑर्थर मिलर से दुखांत और नाकाम विवाह उस दु:ख-गाथा का अध्याय हैं. समूची जिंदगी में वह सच्चे प्रेम के लिए तरसती रही और अंतत: नाकामी ने उसे मृत्यु-मार्ग सुझाया.
जिमी डोहर्टी से मर्लिन ने 16 की उम्र में पहली शादी की, जो बहुत नहीं चली. सफलता के दौरान 1954 में उनकी मुलाकात डिमैगियो से हुई. महज 9 महीनों में ये रिश्ता खत्म हो गया. मिलर ने उसके साथ 5 साल बिताए, पर प्रेम कहां था?

बस यही डायरी में उसने लिखा.. 


‘‘मैं अपनी शादी की वजह से दु:खी नहीं थी. लेकिन, इससे मैं खुश भी नहीं  थी. मैं और मेरे पति मुश्किल से ही एक-दूसरे से बोल पाते थे, और यह  सब इस वजह से नहीं था कि हम एक-दूसरे से नाराज थे. हमारे पास कहने को कुछ नहीं था. मैं इस ऊबाऊपन से मर रही थी. मेरी पैसों में कतई दिलचस्पी नहीं थी, मैं तो बस वंडरफुल होना चाहती थी. करियर वंडरफुल था. लेकिन एक ठंडी रात में उसे आप लपेट नहीं सकते थे. मैं कैलेंडर पर जिंदा रहूँगी, समय में कभी नहीं.’’

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो...
संभवत: उसे मृत्यु से प्यार था..


उसने कहा था..

‘‘मैं बिना फेस लिफ्ट कराए बूढ़ी होना चाहती हूँ. मैं चाहती हूँ कि मुझमें अपने उस चेहरे के प्रति भरोसेमंद रहने का साहस हो, जिसे मैंने बनाया है. कभी-कभी मुझे लगता है उम्रदराज होना टाला जा सकता है और जवान रहते मर जाएं तो बेहतर. लेकिन, तब आप अपनी जिंदगी पूरी नहीं करते. तब आप कभी भी अपने को पूरी तरह से नहीं जान पाएँगे.’’

कहते हैं कि 5 अगस्त 1962 में मर्लिन ने अपनी ही दवा से अपनी जान ले ली.. 5 अगस्त 1962 को लॉस एंजिल्स में अपने घर के शयनकक्ष में मर्लिन मृत मिलीं. घर की देखभाल करने वाली महिला ने तड़के डॉक्टरों को फोन करके बुलाया. दोनों डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. शयन कक्ष बंद होने के कारण उन्हें दरवाजा तोड कर कमरे में घुसना पड़ा. मर्लिन अपने पलंग पर निर्वसना पड़ी पाई गईं. नींद की गोलियों की शीशी उनकी बगल में मिली. अधिकारियों ने बाद में कहा, ‘‘शायद मर्लिन ने आत्महत्या की.’’ लेकिन,अब तक खुदकुशी की थ्योरी पर लोगों को संदेह है..

शायद वह इस बार भी संभवत: प्रेम में नाकाम हो गई थी..


राष्ट्रपति कैनेडी के साथ मर्लिन 
कयास ही है, पर अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी और उसके बीच प्रेम का अंकुर फूट चुका था.. उसने अपना आखिरी फोन कैनेडी को ही किया था.. यह एक रहस्य रहा, जिसकी तस्दीक कभी नहीं हो पाई.. उसकी जिंदगी के अंत के रहस्यों के कई किस्से हैं, पर मर्लिन को न समझ पाना ही इसका अंत है.


मधुबाला जैसी..

पता नहीं क्यों मर्लिन और मधुबाला की तुलना को जी चाहता है...
 मधुबाला : जीवन में मधु 

धरती पर सौंदर्य की देवी ‘वीनस’ के दोनों अवतारों में महज नाम के हिज्जों के आरंभाक्षर का साम्य न था.

दोनों एक ही कालखंड की पैदाइश थीं. 

एक पश्चिम और दूसरी पूरब में. 

दोनों के फिल्मी नाम मूल नाम से बदले हुए. एक का नोरमा जीन्स मॉरटेंसन. दूसरी का मुमताज से मधुबाला.

दोनों ने कम उम्र में काम शुरू किया और अपार सफलता और ख्याति पाई.



दोनों की उम्र 36 साल.

दोनों जीवन भर प्रेम ढूंढती रहीं...


दोनों की मौत रहस्य का पिटारा है..

रविवार, 10 अप्रैल 2011

वलनी में किसानों का कायाकल्प कर दिया तालाब ने

बरास्ता गाँधी, जीवन बदलता एक पानीदार गाँव



इस बार वलनी के ग्राम तालाब की पार पर खड़ा हुआ तो दिल भर आया. हरे, मटमैले पानी पर हवा लहरें बनाती और इस किनारे से उस किनारे तक ले जाती. लगता दिल में भी हिलोरें उठ रही हैं. कहाँ था ऐसा तालाब ? जो था, वो सपनो में ही था. सपने अगर सच हो जाएं तो दुनिया, दुनिया ना रह जाए. मगर आँखें तो सच देख रही थीं. कितने साल, मई की भरी दुपहरी में, जब भीतर तक जला देने वाली लू और देह से सारा जल निचोड़ लेने वाला सूरज धरती के सीने में भी बिबाई बो देता, तब उस सूखे तलहट में चहलकदमी करते हुए सोचा करते कि यहाँ से वहां तक, इधर से उधर तक, भर जाये पूरा तालाब पानी से. आमीन ! तथास्तु !! 

अब तो मुग्ध आँखें नज़ारा देख रही हैं और कान सुन रहे हैं. पार्श्व से फूटती गूंजती आवाज़ में जैसे भविष्यवाणी हो रही है : "इस बार जितना भरा है, उतना तो कई दशकों में नहीं भरा. अब नहीं सूखेगा ये. इसमें दो पुरुष से ज्यादा पानी है." 

पिछले ११ सालों में कितनी ही बार, इस १९ एकड़ के तालाब को पैदल चलते हुए पार करते हुए दिमाग में बेवजह हिंसक तस्वीरें बनने लगतीं, जैसे गाँववालों के दिल से रिसते खून से ही भरेगा ये तालाब. ऐसे-वैसे मिला लो तो कोई २३ सालों का है ये संघर्ष. लेकिन, कोई कह दे कि बूँद भर खून भी माटी में गिरा हो.   फिर केशव  डम्भारे  और योगेश अनेजा के चेहरे उभर आते और खिलखिलाती, मजबूत आवाज आती; ''हम तो ऐसे ही लड़ेंगे. एक कतरा भी खून नहीं गिरेगा. सिर्फ पानी से भरेगा तालाब.'' अचानक चौरी-चौरा  की याद हो आई. गाँधी ने अहिंसा के व्रत के लिये कितना बड़ा त्याग किया था! सबके विरोध के बावजूद पूरा आन्दोलन रोक दिया. महात्मा के संकल्प  को असली मायनों में ये लोग अपनी लड़ाई के मार्फ़त आगे बढ़ा रहे हैं.  सचमुच, अनवरत संघर्ष से निकले पसीने और पानी ने ही यहाँ की धरती को सींचा है और उससे जो बेलें फूटी हैं, वे दुनिया को राह दिखने वाली हैं. 

चलिए पहले वलनी का किस्सा सुनते हैं, और फिर हासिल की बात करते हैं. 

ये समाज और सत्ता, जनता और जनार्दन, गण और तंत्र के बीच जारी अनवरत द्वंद्व की कथा है. विषयवस्तु बस इतनी-सी है कि एक गाँव है; गाँव का एक निस्तारी तालाब है और मालगुजार/ जमींदार है. जमींदार तालाब हड़प लेता है और गाँव वाले उसे छुड़ाने के लिये अथक आन्दोलन करते हैं. सारी व्यवस्था, सत्ता और राजनीतिक तंत्र, न्याय प्रणाली जमींदार के पक्ष में अंगद के अंदाज़ में खड़ी है. जनता का मोर्चा भी लगा है. तालाब को ग्राम समाज ने अपने कब्जे में ले लिया है. अंततः उपसंहार का इंतजार है. लेकिन, इस तालाब और उसकी लड़ाई ने वलनी के जीवन को बदल दिया है, जीवन स्तर को आर्थिक और सामाजिक तौर पर सतह से बहुत ऊपर उठा दिया है. तालाब खुद भी तब्दील हो गया है, जीवनधारा में. उसने किसानों को जीने के नए मायने सिखाये हैं. अपनी जमीन और खेत से फिर से प्यार करना सिखाया है. 

वलनी नागपुर से महज २१ किलोमीटर दूर है और वहां ये सब कुछ घट रहा है. ये हुआ कैसे और आखिर हुआ क्या?, जानने के लिये अतीत के झरोखों से तीन दशक पीछे झांकना पड़ेगा. 

सन १९८३ की बात है. नौसेना से नौकरी छोड़कर एक नवयुवक अपने गाँव लौट आया. यानी केशव रामचंद्र डम्भारे. पिता रामचंद्र गाँव के सरपंच थे और किसान भी.  लेकिन केशव को खेती नहीं करनी थी. उनके मन में एक दूसरा है ख्याल था. सहकारी समिति से लोन लेकर उसने चार भैंसें खरीदीं और डेयरी फार्म खोला. दूध की सप्लाई नागपुर होती. सालभर के भीतर चार से दस भैंसें हो गईं. आमदनी काफी बढ़ गई. लेकिन, एक समस्या बरक़रार थी. गाँव में पानी नहीं था. ग्राम-तालाब मार्च खत्म होते-होते सूख जाता. फिर शुरू होती असली कसरत. केशव और उनका कर्मचारी रोजाना खेत के कुएं से प्रति भैंस आठ बाल्टी पानी खींचते. यह काम उन्हें इतना थका देता कि शेष कुछ नहीं हो पाता. बच्चों को भीषण गर्मी से  निजात दिलाने के लिये वे कूलर खरीद लाये, पार उसमें पानी डालने के लिये रात १२ बजे तक का इंतजार करना पड़ता. इसके पहले तक गाँव के एकमात्र हैण्डपम्प पार महिलाओं का कब्ज़ा रहता, जो अपने घरों के लिये लड़ते-झगड़ते पीने का पानी भरतीं. नतीजा ये हुआ कि पानी के अभाव के मारे केशव ने डेयरी फार्म बंद करने का फैसला किया. इसके बावजूद उनके दिमाग को एक सवाल मथता रहता. गाँव में इतना बड़ा तालाब है, बारिश भी अच्छी होती है. इसके बावजूद पानी की इतनी किल्लत क्यों?  नतीजे पर पहुंचे कि तालाब में गाद जमा हो गई है और जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया)  से पानी तालाब में बहकर नहीं आता है. अधसूखे तालाब में मार्च तक थोड़ा-बहुत पानी रहता है और फिर जून तक सूखा. बारिश आई तो भरा, वर्ना ढोर-डंगरों का काम किसी तरह चलाना पड़ता. गाद कोई निकलता नहीं. हर साल मिर्च, बैंगन, टमाटर, सेम, कद्दू लगाना हो बुजुर्गों के कहने पर तलछट से दो-चार छिटुए मिट्टी भर लाये और बीज बो दिए. अंकुर फूटे तो खेत में लगा दिए. 

तालाब को गहरा करने के लिये यह काफी नहीं था. हद तो तब हो गई, जब अचानक दो भाई भगवान और श्रावण नान्हे आए और तालाब में मछलियाँ पालने लगे. पता लगाया तो मालूम हुआ कि गाँव तालाब का पॉँच एकड़ हिस्सा जमींदार/ मालगुजार रुद्रप्रताप सिंह पवार ने बेच दिया है. सवाल उठा: तालाब तो गाँव का था, जमींदार ने कैसे बेच दिया? तहसीलदार से शिकायत की तो नान्हे बंधुओं और जमींदार पवार का कब्जे की पुष्टि हो गई. यही नहीं, शेष १४ में से पॉँच एकड़ सीलिंग में चला गया. गाँव में हड़कंप. केशव ने दस्तावेज निकलवाए तो पता चला अंग्रेज सरकार के बंदोबस्त के मुताबिक १९११-१२ में तालाब को जमींदार से सरकारी कब्जे में ले लिया गया था. लेकिन बाद में किसी तरह जमींदार ने उसे अपने नाम चढवा लिया. गाँव वाले इसके खिलाफ एक हो गए. तहसीलदार   से लेकर कलेक्टर, ग्राम पंचायत से लेकर जिला परिषद तक, शिकायत की. कोई नतीजा नहीं निकला. साल दर साल निकलते गए. फिर आया वर्ष १९९७. इस गाँव में योगेश अनेजा अपने दोस्त योगेश वानखेड़े के साथ पहुंचे. केशव और उनके साथियों ने उनका स्वागत किया और तालाब की बात निकली. योगेश ने सलाह दी कि तालाब किसी का भी हो पहले उसे खोद लिया जाये. गाँव वाले श्रमदान करें. शुरुआत हुई, पर बात नहीं बनी. हाथ से तालाब खोदना संभव नहीं था और गाँव में किसी के पास 'बेगार' के लिये समय भी नहीं था. तब गाँव में अलख जगाने के लिये केशव और योगेश के दस्ते ने वृक्षारोपण शुरू किया. धीरे-धीरे एक बात और समझ में आई कि बरसात का पानी गाँव में रुकता नहीं है, इसलिए खेतों में ही जलसंग्रह जरूरी है. सड़क बन रही थी तो ठेकेदार गाँव के गौण खनिज यानी मुरुम लूट रहा था. योगेश और केशव के दस्ते ने उसे रोका और राज़ी किया कि वे जहाँ से कहें, वहां से मुरुम निकली जाये. ठेकेदार मान गया और गाँव में पहली बार एक पोखर (छोटा तालाब) बन गया. पानी जमा हुआ तो कुओं का जलस्तर बढ़ गया. गाँव के किसानों का विश्वास इस हरावल दस्ते पर जमने लगा. ग्राम पंचायत के कोष से लोग शेततली (खेत तालाब) बन्ने के लिये राजी होने लगे. पानी रुकने लगा तो कुएं भरने लगे. सिंचाई ज्यादा होने लगी. लेकिन ग्राम-तालाब की हालत अब भी खराब थी. योगेश ने केशव के सहयोग से आमराय बनवाई कि जेसीबी मशीन से तालाब खोदा जाये. लेकिन, उसकी मिट्टी का क्या हो? बुजुर्गों का अनुभव और परंपरागत ज्ञान काम आया. तय हुआ कि हर खेत में एक टिप्पर मिट्टी डालने के २०० रुपये देने होंगे. नुकसान होने की सूरत में भरपाई की जिम्मेदारी भी ली. पहले ही दिन एक लाख चार हज़ार रुपये इकट्ठे हो गए. नतीजा अच्छा रहा. तालाब खुदने लगा और जिन खेतों में ये मिट्टी डली, उसमें फसल भी कई गुना हो गई. आसपास के गांवों से भी आर्डर आने लगे तो गाँव के  किसानों की हिम्मत भी बढ़ी और साल दर साल काम चलता गया. कई बाधाएं आईं. मालगुजार ने लठैतों, अपराधियों, पुलिस, प्रशासन, नेताओं, अदालत; सबकी मदद ली और पूरा जोर लगा दिया कि तालाब उसके हाथ लग जाये. नान्हे बंधुओं ने भी काफी बाधाएं डालीं. चुनावी राजीनति के चलते गाँव में बने दो गुट से भी काम प्रभावित हुआ. लेकिन, केशव के नेतृत्व और योगेश के मार्गदर्शन में गाँववाले अडिग रहे. ट्रैक्टर के सामने बिना डरे लेटे, लाठियां खाईं, अनशन किया, दौड़-भाग की, कागज-फाइलें फिरवाईं, महीनों कलेक्टर और अफसरों के दफ्तर के सामने बैठे, जेल गए. लेकिन, हारे नहीं. १५ साल से हर रोज़ किसी ना किसी मुसीबत से लड़ते-लड़ते आदत सी हो गई है. यह तब तक चलेगा, जब तक कि तालाब गाँव का ना हो जाये. एक अच्छा काम हुआ. केशव और उनके साथियों की संख्या बढाती चली गई. अब हाल यह है कि पूरा गाँव एक है. राजनीतिक विरोधी भी साथ मिलकर ये काम कर रहे हैं. इस संघर्ष ने केशव और योगेश को सिखाया कि हर बार गाँव की तरक्की का  नया आइडिया खोजा जाये और उसे अमल में लाया जाए. पिछले साल यह हुआ कि पंचायत की मर्ज़ी के मुताबिक सड़क बनने वाले ठेकेदार ने मुरुम निकलने के लिये आधे से कुछ काम तालाब को १५ फुल गहरा खोद दिया. लेकिन, अब उसमें पानी भरने का संकट था, क्योंकि जलग्रहण क्षेत्र उसे पूरा नहीं कर पाता. यहाँ गाँव वालों की देशज समझ काम आई. उन्होंने ठेकेदार से गाँव के बाहर से तालाब तक एक छोटी नहर बनवा ली. बरसात में इस नहर से होता हुआ इतना पानी इस तालाब में आया कि वह पूरा भर गया और अब शायद ही कभी खाली हो. दूसरा हिस्से की खुदाई के लिये पानी निकलने के वास्ते पम्प लगाना पड़ रहा है. दूर तक के कुएं भर गए हैं. नान्हे भी खुश है. उसका गाँव वालों से समझौता हो गया है. वह पूरे तालाब में मछलियाँ पालता है और लाखों की मछलियों के बदले सालाना सात हज़ार रुपये ग्राम पंचायत को देता है. यानी आम के आम, गुठलियों के दाम. इस एक  तालाब ने गाँव का जीवन बदल दिया है. जरा आश्चर्य हो सकता है, पर योगेश कहते हैं : कोई लूट सके तो लूट ले हमारे गाँव की मिट्टी और मुरम को. 

वर्षों के सत्याग्रह का नतीजा वलनी फार्मूले के तौर पर निकला है.  अब यह बहुवचन हो गया है यानी 'फार्मूलों'.

१. पहला फार्मूला था कि तालाब को खोदो और उसकी गाद खेत में डालो. इससे फसल कई गुना बढ़ जाएगी. वलनी और आसपास के किसानों ने इस फार्मूले को अपनाया और बकौल योगेश, वे अब अपने उन खेतों से प्यार करते हैं, जिन्हें वे कभी पैदावार ना होने की वजह से बेचना चाहते थे.  फसल दोगुनी होने से आमदनी बढ़ गई है. उनका जीवन स्तर सुधर गया है. गाँव में १०० से ज्यादा पक्के मकान बन गए हैं. गाँव का हर बच्चा स्कूल जाता है. शराब और क़र्ज़ की लत अपने आप काम हो गई है. महिलाओं की पिटाई लगभग बंद हो गई है. तालाब खोदने से 
२. दूसरा फार्मूला पूरे गाँव और खेतों में खेत-तालाब बना दिए जाएं. गाँव में अब छोटे-बड़े २४ तालाब हैं. योगेश और केशव इसे 'ऑपरेशन तालाब' कहते हैं. इन तालाबों ने खेतों को पानीदार और उपजाऊ बना दिया. अब यहाँ गर्मियों की छोटी-मोती फसलें और सब्जियों की खेती भी होने लगी. उनका लक्ष्य फ़िलहाल १०० तालाबों का है. 
३. तीसरा फार्मूला बरसात में गाँव से बह जाने वाले पानी को रोकने और संग्रह करने का है. वलनी गाँव की कुल जमीन का १०-१५ फ़ीसदी हिस्सा ऐसा था, जो बरसात के दौरान नालों में तब्दील हो जाता था. ये नाले जमीन को बंजर बना देते थे और जमीन के मालिक किसान परेशान थे. इन नालों के रास्तों की पहचान करके अब कुछ माध्यम आकर के तालाब बना दिए गए है. इससे पानी अब यहाँ जमा हो जाता है और वह जमीन काम में आने लगी. इससे किसानों को दोहरा फायदा हुआ. 
४. चौथा फार्मूला गाँव के गौण खनिज का अपनी मर्जी से दोहन का है. योगेश बताते हैं कि पहले ठेकेदार ३० ट्रिप की रॉयल्टी देकर ३०० ट्रिप मुरुम निकालता था. वह भी अपनी मर्जी से. इससे गाँव में कहीं भी बड़ा गड्ढा हो जाता था और कोई काम भी नहीं आता था. हमने उसे रोका और कहा हमारी मरजी से मुरुम निकाले. यह तरकीब काम आई और वलनी में कई तालाब इसके भरोसे बन गए. योगेश को उम्मीद है कि ये फार्मूला अगर हर गाँव में अपना लिया जाए और कलेक्टर इस पर ध्यान दे तो तालाब खुदवाने पर अलग से खर्च करने की जरूरत नहीं है. पेयजल और निस्तार, दोनों इसी से निपट जाएं. 
५. पांचवां फार्मूला बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने का है. गाँव में ऐसे कई खेत हैं, जो बंजर पड़े हैं. उन्हें उपजाऊ बनाने के लिये किसानों के पास पैसे नहीं हैं. हाल ही में वलनी में केशव और योगेश ने ये प्रयोग किया. एक बंजर जमीन पर तालाब की मिट्टी डलवाई और उस हिस्से में मंडवा लगाकर करेला, चौलाई, सेम, कद्दू, लौकी, तुरई जैसी बेलवर्गीय फसल लगाईं. नतीजा, चौंकाने वाला था. इतनी फसल हुई कि आसानी से कोई किसान लगत और मुनाफा निकल ले. छोटे और भूमिहीन किसानों को ये प्रयोग पसंद आये और वे इन्हें बड़े पैमाने पर करने की तैयारी कर रहे हैं. 
६. छठा फार्मूला श्रमदान का है, जो गाँव में परिवर्तन ले आया है. हर सप्ताह गाँव के कुछ लोग, बच्चे, बूढ़े और जवान चार घंटे ग्राम सफाई करते हैं. स्कूल के छात्र और अध्यापक भी. इससे गाँव में घर के आसपास ही कूड़ा फ़ैलाने की प्रवत्ति पर रोक लगने लगी है. खासकर प्लास्टिक पन्नी से होने वाला कचरा काम हो गया है.
७. सातवाँ फार्मूला टिकोमा गौड़ी चौड़ी के बारहमासी फूलदार पौधे लगाने का है, ताकि गाँव सुन्दर दिखे. वलनी ने सफलतापूर्वक इस काम को पूरा किया है और इसके लिये बेकार पड़ी चीजों से कठघरा भी तैयार किया है, ताकि पशु उसे खा ना जाएं. 
८. आठवां फार्मूला ग्राम में हर घर में शौचालय का है. यह इस गाँव का अद्भुत प्रयोग था और श्रमदान से चलते अब यहाँ ९९ फ़ीसदी घरों में शौचालय हैं. इसके लिये गाँव को राष्ट्रपति से निर्मल ग्राम पुरस्कार भी मिला. 
९. नौवां फार्मूला हर घर में पेयजल के लिये नल का था. पंचायत ने इसके लिये टंकी बनाई और फिल्टर, शुद्ध जल सप्लाई किया जाता है. इससे लोगों के स्वास्थ्य में सुधार तो आया ही, पानी के लिये आपसी झगड़े भी बंद हो गए. 
१०. दसवां फार्मूला पीढ़ी दर पीढ़ी इस गहरे ज्ञान को बनाये रखने के लिये दी जाने वाली सीख है, ताकि भविष्य में भी ये सब चलता रहे. 

योगेश अनेजा इस फार्मूले को कहते हैं : १-१००-१०००-१००००.

उनकी परिभाषा में एक का मतलब हर सप्ताह एक घंटे का श्रमदान. सौ का मतलब १०० छोटे-बड़े तालाब. १००० का अर्थ एक हज़ार टिकोमा गौड़ी-चौड़ी के पेड़ लगाना, ताकि तितली, भौंरे, मधुमक्खी समेत मनुष्य-मित्र कीट बचे रहे. १०००० के मायने १०००० बेलवर्गीय खेती के मंडवे पूरे गाँव में तैयार करना, ताकि कोई भूखा ना रहे. वे कहते हैं देश के पॉँच लाख गाँव के बीच वलनी एक दारोगा की तरह खड़ा है कि पानी की लूट रोकी जा सके.

वलनी गाँव की कथा के ये कुछ अध्याय हैं. पूरी महागाथा सुनने और गुनने के लिये आपको आना होगा इस गाँव तक. ग्राम तालाब की लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है. तहसीलदार और कलेक्टर ने हाथ खड़े कर दिए हैं. कहते हैं सरकारी जमीन पर पंचायत को कब्ज़ा दिलाने के लिये बड़ी अदालत में मुक़दमा लड़ना पड़ेगा. सत्य के आग्रही इसे नहीं मानते. वे कहते हैं : शायद, जमींदार का दिल बदल जाए और वह अपना अवैध कब्ज़ा छोड़ दे. इन दिनों वे तालाब की पार तैयार करने में जुटे हैं. 




ये दो साल पहले के फोटो हैं. उसके बाद से और कई तब्दीलियाँ हुई हैं. 






































एक माह में बन गए १२० शौचालय 

किसी भी गाँव की साफ-सफाई में शौचालय का होना बेहद महत्त्वपूर्ण है. अगर गाँव वाले खुले में शौच करें तो गन्दगी घर, शरीर और दिमाग में कब्ज़ा कर लेती है. वलनी तो आदर्श गाँव योजना में शामिल गाँव था. लेकिन, उसकी हालत भी दूसरे गाँव की तरह थी. लोग खुले में शौच करते. हमेशा बदबू आना गाँव का अभिशाप था. लेकिन, क्या हो सकता था? सब चाहते थे कि घर में ही शौचालय हो, पार सबसे बड़ी समस्या थी पानी का अभाव. एक बार शौचालय जाने में दो बाल्टी पानी खर्च होता. गाँव का एकमात्र हैण्डपम्प सैकड़ों बार चलने पर एक बाल्टी पानी देता. ये सबके बूते के बाहर था. तालाब के काम के लिये योगेश और केशव एक दिन बीडीओ के पास गए तो उन्होंने बताया कि निर्मल ग्राम पुरस्कार मिलने वाला है. एक लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन, यहाँ के किसी गाँव को नहीं मिल सकता क्योंकि किसी भी गाँव में १०० फीसदी शौचालय नहीं हैं. योगेश और केशव ने कहा, हमारे गाँव को मिल सकता है. बीडीओ चकित. बोले-नहीं मिल सकता, क्योंकि ९८ फ़ीसदी घरों में शौचालय नहीं हैं. योगेश-केशव ने कहा-बन जाएंगे. बीडीओ ने कहा-अगर ऐसा हो जाए तो क्या बात है. मैं अपनी जेब से ५००० रुपये दूंगा. योगेश-केशव गाँव लौट आये. गाँव वालों के साथ बैठक की. गांववालों ने कहा-नहीं हो सकता. सब हो जाए, पर मिस्त्री कहाँ है? बाकी का पैसा कहाँ से आएगा. योगेश ने अपनी जेब से २०००० रुपये देने का वादा किया तो तब तक उप सरपंच बन चुके केशव ने पंचायत से ईंट, रेत, सीमेंट देने की बात पक्की कर दी. हर शौचालय पर सरकारी हिसाब से ४०० रुपये अनुदान भी मिलना था. हर शौचालय बनाने पर कुल खर्च ४००० रुपये आना था. यानी तकरीबन १५०० रुपये हर घर के मालिक को लगाने थे. वे तैयार हो गए. अब सवाल मिस्त्री का था. योगेश ने इस समस्या का हल भी निकल लिया. कहा- वे नागपुर से मिस्त्री लाएंगे, पर ५ बाई ५ बाई ५ का गड्ढा खुद खोदना होगा और मिस्त्री के साथ कुली का काम करवाना होगा. सब तैयार हो गए. फिर क्या था-रोज़ सुबह नागपुर के गिट्टीखदान चौराहे से योगेश अपनी मारुति-८०० कर में ५ मिस्त्री लादकर गाँव तक लाते और गाँव के दो मिस्त्री. सात मिस्त्री रोज़ गाँव में हर दिन सात शौचालय तैयार कर देते. महीना बीतते-बीतते १२० शौचालय तैयार हो गए. बीडीओ और अन्य अफसर आए तो अचरज से भर गए. लेकिन, योगेश और केशव निर्मल ग्राम पुरस्कार लेने नहीं गए. उस सरपंच को भेजा, जो राजनीतिक रंजिश में सारे कामों में पलीता लगाए हुए था. वह लौटा तो इस टीम  का फैन बन गया. वह दिन था और आज का दिन है, गाँव में कोई गुट नहीं बचा. हाल ही में आदर्श गाँव समिति की बैठक में इस उपलब्धि पर इतनी तालियाँ बजीं कि बहुप्रशंसित करोड़पति गाँव हिवरे बाज़ार के करता-धर्ता पोपटराव पवार भी शरमा गए. उनके गाँव में तीन माह में तीन शौचालय ही बन पाए हैं. बस केशव डम्भारे  को एक ही दुःख है कि दो घर अब भी छूट गए हैं. 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है....


हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है....

साक्षात्कार : केशव डम्भारे


केशव डम्भारे अभी ५४-५५ के हैं. २४ साल पहले जब नौसेना की नौकरी छोड़कर वे आपने गाँव पहुंचे तो पानी की विकराल समस्या से उनका आमना-सामना हुआ. तबसे वे लगातार अपने साथियों के साथ मिलाकर ग्राम-जल के पुनर्जीवन के लिये लड़ रहे हैं. वे विज्ञान में किसी कारण डिग्री पूरी नहीं कर पाए, पर ग्रामजीवन का विज्ञान उन्हें खूब आता है. उन्हें मालूम है कि किस रसायन में किस तत्त्व के मिलन से ऊर्जा निकलेगी और किस तत्त्व को मिलाने से विस्फोट होगा. वे फ़िलहाल वलनी गाँव के उपसरपंच हैं और राजनितिक-समाजकर्म ही उनकी जिंदगी का प्रमुख उद्देश्य है. राजनीति के सारे पैंतरे और दांव-पेंच उन्हें पता हैं, पर वे सार्वजानिक जीवन की शुचिता में विश्वास रखते हैं. जनता के जागरण पर उन्हें अगाध भरोसा है और यही कारण है कि वे गाँधी, विनोबा के रास्तों पर चलना चाहते हैं. उनके सब्र ने उनके राजनीतिक विरोधियों को भी उनका मित्र बना दिया और यह थाती उन्हें उनके पिता दिवंगत रामचन्द्रजी गणपतराव डम्भारे से मिली. उनके पिता कई सालों तक निर्विरोध गाँव के सरपंच थे. अब वे अपने राजनीतिक विरोधियों को भी निर्विरोध चुनवाने का माद्दा रखते हैं. वलनी में ग्राम तालाब का पुनर्जीवन और उसे ग्राम सम्पदा बनाना उनका लक्ष्य है. योगेश अनेजा और केशव डम्भारे एक गाड़ी के दो पहिये हैं, जो नए-नए प्रयोगों में दिलचस्पी रखते हैं. उनके प्रयोगों से ही गाँव इस मुकाम तक पहुँच गया है. उनसे सीधी बात करके इसे समझा जा सकेगा :

- आखिर ऐसा क्या हुआ कि गाँव लौट आए? 
-अपना गाँव सबसे अच्छा हो, हमेशा से मेरा सपना था. नौसेना छोड़कर यहाँ पहुंचा तो असलियत सामने आई कि हम कितने पिछड़े हैं. यहाँ पानी की भरी किल्लत थी. पशुओं के लिए चारा नहीं था. खेत सूखे थे और पैदावार अच्छी नहीं थी. लागत से आमदनी हमेशा कम थी. सीधे कारण थे - सिंचाई सुविधा का ना होना, मिट्टी की उर्वरता का नष्ट होना और उसे बढ़ाये जाने के प्रयास ना किये जाना आदि. मैंने इस मामले में जनजागरण करने का प्रयास किया और पहला काम तालाब को फिर से संवारना था. 

-मालगुजार इतना प्रभावी है और व्यवस्था भी आपके खिलाफ है, लेकिन आपकी इतनी लम्बी लड़ाई कभी टूटी नहीं?
-हम सत्याग्रही थे. हम कोई गलत काम नहीं कर रहे थे. हम आन्दोलन ऐसे करते थे कि मन, विचार और शरीर से कभी हिंसा ना हो. इसलिए हमारी ओर से उनको कभी मौका नहीं मिला. फिर भी हम सात लोगों को दलित प्रताड़ना कानून के झूठे मुक़दमे में फंसाया तो हम सच्चाई के कारण अंततः छूट गए. 

-तालाब की मिट्टी खेत में डालने का ख्याल कैसे आया?
-ये पुराना तरीका था. बड़े-बूढ़े बताते थे कि बेल वाली सब्जी लगनी हो तो तालाब की मिट्टी ले आओ. हर किसान साल में एक बार दो-चार बैलगाड़ी मिट्टी अपने खेत में डालता और टमाटर, मिर्ची, सेम, कद्दू, लौकी बो देता. पौधे आते तो उसे खेत में लगा देता. लेकिन जिस हिस्से में ये मिट्टी पड़ती, वहां होने वाला अन्न काफी स्वादिष्ट और अच्छा होता था. यहीं से ये ख्याल आया कि पूरे खेत में मिट्टी दल दी जाएगी तो पूरी फसल अच्छी हो जाएगी. ये बात सच साबित हुई. पैदावार बढ़ गई. फिर पानी बढ़ा तो इसमें और इजाफा हो गया. 

-आपने गाँव में क्या बदलते देखा?
-लोगों का जीवन स्तर सुधर गया. आमदनी अच्छी हो गई तो रहन-सहन, खाना-पीना, पढाई-लिखाई, सब चीजों का स्तर बढ़ गया. धड़धड़ पक्के घर बन गए.

-सिर्फ आर्थिक विकास हुआ या सामाजिक भी?
-हर स्तर पर प्रगति दिखती है. गाँव की शराब की दुकानें बंद हो गईं. लोगों का शराब पीना कम हो गया. महिलाओं के साथ मारपीट बंद हो गई. बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने लगे. लड़कियां पढ़ने लगीं. हर बच्ची स्कूल जाती है. लोगों में वैमनस्य कम हुआ है. यहाँ तक कि १२-१३ भूमि हीन परिवारों का जीवन स्तर भी बढ़ा है. उनमें से कुछ ने जमीन भी खरीद ली है. लोग अब खेत बेचने की बात नहीं करते. अब वे कहते हैं, हम अच्छे और हमारे खेत अच्छे. खेती के प्रति ये जो प्रेम बढ़ा है, वो सामाजिक तरक्की का द्योतक है. 

-कुछ कमी रह गई? 
-हाँ. अभी भी तालाब हासिल करना बाकी है. हम नागपुर जिले के एकमात्र आदर्श गाँव हैं, पर यहाँ अब भी दो घरों में संडास (शौचालय) नहीं हैं. वे खुले में दिशा मैदान जाते हैं. लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन की हवा चल रही है. वो गति पकड़ेगी तो देश बदल जायेगा. हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है.


-सुनील सोनी 

ये ना थी हमारी किस्मत कि विसाल ए यार होता..

ये न थी हमारी किस्मत...  

फिल्म विश्लेषण : सात खून माफ़


निर्देशक/ संगीतकार : विशाल भारद्वाज


निश्चय ही 'सात खून माफ़' एक ऐसी फिल्म है, जो आपको राहत देती है कि आप अकेले ही नहीं हैं, जो जिंदगी में चाही-अनचाही घुसपैठों को भुगत रहे हैं. आपकी जिन्दगी में दाखिल लोग, जिनके मुखौटे उतरने  पर दुनिया के तमाम असौंदर्य और अधैर्य का अहसास होता है, सारी चीजों को बंजर बना चुके होते हैं. तब आप एक फैसला लेते हैं, उन्हें जिन्दगी  और दुनिया से खारिज करने का. अधीरता में ही सही, निर्णय का यही चरम संभवतः जीवन की दुश्वारियों के बीच से पगडंडियाँ  बनाता है. रस्किन बांड की लघुकथा  'सुजेना'ज सेवेन हसबैंड' पर आधारित इस फिल्म में विशाल भारद्वाज ने  बड़ी सफाई से पुरुष प्रधान समाज की बखिया उधेड़ी है. पहली नज़र में सुजेना का चरित्र आपको 'निम्फो-मेनियक'  दिखाई पड़ सकता है, पर ऐसा है नहीं. असली प्यार की तलाश सुजेना को कहाँ नहीं ले जाती, पर हर बार पैकिंग के चमकदार रैपर उतरते ही बदसूरती अपनी सारी भयावहता और सड़ांध के साथ ऐन मुंह के सामने आ खड़ी होती है. वास्तव में ये सुजेना और उसके रिश्तों की पड़ताल नहीं है; ये समाज के बहुस्तरीय अस्तरों में छिपे सच की खुरचन है.

यह एक खूबसूरत एंग्लो-इंडियन युवती सुजेना ऐना मेरी जोहानिस उर्फ़ साहेब की कथा है. फिल्म में यह किरदार प्रियंका चोपड़ा ने निभाया है. बचपन में है माँ के साए से महरूम हो गई सुजेना फिर से वही स्नेह पाना चाहती है. सच्चा प्रेम पाने के लिये एक के बाद एक, सात शादियाँ करती है, पर प्यार की जगह धोखा खाती है. छह पतियों का  क़त्ल  करती है और सातवाँ खून खुद अपनी शिनाख्त मिटाकर करती है. फिल्म में फोरेंसिक डॉक्टर अरुण (विवान शाह)  अपनी पत्नी नंदनी (कंकणा सेन शर्मा)  सुजेना की कथा कहता है, जो उसे देखते और चाहते हुए बड़ा हुआ है. सुजेना का पहला पति एडविन रोड्रिक्स (नील नितिन मुकेश) सेना का एक लंगड़ा मेजर है, जो बेहद क्रूर है और बीवी को सिर्फ भोग्य और संपत्ति समझता है. सुजेना के स्वाभिमान को चोट पहुंचाकर तृप्ति पाने वाले मेजर को सुजेना आदमखोर शेर का निवाला बनवा देती है. फिर उसकी जिंदगी में जमशेद सिंह राठोड़ (जॉन अब्राहम) आता है, जिसे सिर्फ उसके पैसे से मतलब है. ड्रग्स, लड़कियां, संगीत चोरी से निपटते निपटते सुजेना उसे अंततः हेरोइन ओवरडोज से मुक्ति दिलवा देती है. तीसरा शौहर वसीउल्लाह खान (इरफ़ान)  अच्छा शायर है, पर बिस्तर पर बेरहम जल्लाद. उसे जीते-जी कब्र नसीब होती है. चौथा शौहर रूसी जासूस निकोलाई वेरोंसकी (अलेक्जेंद्र दायचेंको) दोहरी जिंदगी जी रहा है. सुजेना इस छल को नहीं बख्शती. पांचवां पति कीमतीलाल (अन्नू कपूर ) उसके जिस्म का दीवाना है और कुछ जरा जल्दी ही वियाग्रा का ओवरडोज खाकर मरता है. छठा हसबैंड डॉ. मधुसूदन तरफदार (नसीरूदीन शाह ) उसकी संपत्ति हड़पने का भेद खुलने पर मारा जाता है. इन पूरे चक्करों में सुजेना ना केवल यह समझ गई है कि खूबसूरत जिस्म का इस्तेमाल कैसे किया जाये, पर यह भूल भी गई है कि सिर्फ जिस्म ही मंजिल नहीं है. इसलिए वह जब नौजवान हो चुके अरुण को पाना चाहती है, तो वह इंकार कर देता है. उसका दिल फिर एकबार टूटता है, पर उसे परिणति पर पहुँचने का सबक भी देता है. पूरी फिल्म का दूसरा भाग ही ज्यादा तेज घटनाक्रमों से भरा है, जहाँ फ्लैशबैक और वर्तमान एक जगह आकर मिलते भी हैं. खुद रस्किन बांड का एक किरदार में होना अच्छा महसूस करता है. यह फिल्म आपको सुकून का अहसास नहीं करने देती, क्योंकि सुजेना को भी चैन नहीं है. लेकिन, आप खुद को उसके करीब पाते हैं. वह आपकी रूह में सुरसुरी पैदा करती है. 

प्रियंका ने सुजेना के चरित्र को जीने में जी-जान लगा दी है और केंद्रीय पात्र का आभामंडल इतना असरदार है कि अरुण के अलावा बाकी सब किरदार गौण लगते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि उनका अभिनय कमतर है. हर कोई अपनी कहानी चलने तक बेहद प्रभावी हैं. यहाँ तक कि नील नितिन मुकेश और जॉन भी. नसीर और इरफ़ान अपनी टाईप्ड छवि के मारे हैं, पर ठीक हैं. अन्नू कपूर किरदार के अनुकूल हैं, और उषा उत्थुप तो पहली बार पता चला कि अदाकारा भी हैं. एक डार्क फिल्म में सिनेमेटोग्राफी कितनी प्रभावोत्पादक होनी चाहिए, यह रंजन पंडित ने दिखाया है.  

संगीत का जिक्र किये बगैर फिल्म पूरी नहीं हो सकती. फिल्म का काल और कैनवास काफी बड़ा है, इसलिए संगीतकार के रूप में विशाल ने कई प्रयोग किये है, जो अच्छे हैं. रूसी लोकगीत का प्रयोग भी. गुलज़ार हैं ही. उषा उत्थुप और रेखा भारद्वाज आवाज के जरिये फिल्म में कई रंग भरती हैं. पता नहीं क्यों, सुरेश वाडेकर का 'तेरे लिये' एल्बम में होने के बावजूद फिल्म से गायब है. बैकग्राउंड स्कोर बढ़िया है और कथा को सहारा देने में कामयाब है. 

विशाल की किस्सागोई पिछली फिल्मों में अच्छी रही है, पर यहाँ वे कुछ कथा कहने के तरीके को लेकर असमंजस में दिखाई देते हैं. वैसे भी, इतनी सपाट; पर परतदार कथा को कहना खेल नहीं. शायद यही कारण होगा कि पटकथा लिखने के लिये उन्हें विदेशी पटकथाकार की मदद लेनी पड़ी. यह भी कहना होगा कि निर्देशक, संपादन के स्तर पर भी चूक गया. फिल्म संपादक ए. श्रीकर प्रसाद ने अपना काम किया है, पर उन्हें निर्देशक की ओर से वह मदद नहीं मिली, जो फिल्म में कसाव ले आती. एक बात और... विशाल अपने गुरु गुलज़ार का फ्लैशबैक का जुनून समझ तो गए, पर इस हुनर में उतनी सफाई नहीं ला पाए हैं. नतीजा यह कि फिल्म की लय और गत बिगड़ गई. बहस इस पर भी हो सकती है कि क्या निर्देशक के पास खुद कथा कहने का माद्दा नहीं था, जो सूत्रधार और कथा-कथन का सहारा लेना पड़ा? निर्देशक की इससे बड़ी कमजोरी और क्या होगी? 

इसके बावजूद प्रयोगधर्मी विशाल को सराहे बगैर नहीं रहा जा सकता. 

सुनील सोनी 

गुरुवार, 24 मार्च 2011

रेतघड़ी



वक्त मुट्ठी से यों फिसला जा रहा है कि रेत हो. ऐसा भी हो कि हम ही रेतघड़ी की रेत में तब्दील हो गए हों. जब नए सूरज की प्रतीक्षा की सीमारेखा पर खड़े हैं तो कुछ सिरहन, कुछ स्फूर्ति के साथ अहसास हो रहा है, नई सदी/सहस्राब्दि के तीन पड़ाव (अब ग्यारह) दुनिया ने किस तेजी से मापे हैं ! महसूस यह भी होता है कि काल संभवतः गणनाओं में भाग रहा है, प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना होने के बावजूद आदमी भूत-गुफाओं की भूलभुलैयां में वहीं है, जहां सहस्राब्दियां उसे छोड़ आई थीं. सभ्य और नैतिक होने के मुहावरे उसने आत्ममुग्धता में गढ़े हैं, पर जब भी मौका आता है, भ्रम की केंचुल छोड़कर हकीकत में लौट आता है. उस दुनिया में, जहां अस्तित्व तथा सत्ता बचाने के लिए वह किसी को बख्शता नहीं. ग्रेगोरियन कैलेंडर में पहले दिन से ३६५वें दिन तक कितने वर्ष इसके गवाह हैं. दो हजार तीन भी.
जब साल का आखिरी दिन बीतने में कुछ ही घंटे शेष हैं, पीछे पलटकर देखता हूँ. ठिठक जाता हूँ... कितनी बदसूरत हो चली है धरती. कितने जख्म लगे हैं, कितने बदरंग दाग; तमाम सौंदर्य यों बिखरा है कि कुरूपता उसका हिस्सा हडपने लगी है. सचमुच ! सभ्य होने के दंभ भरने वाला आदमी इतिहास को कितने बार दोहराता है. युद्ध बार-बार इतिहास  के कैदखाने से निकल आता है, डराता है और मासूमियत के मुखौटों से क्रूरता छन-छनकर बाहर आने लगती हैं. बेच-खरीद के जुमले से दुनिया भर को मूर्ख बनाने वाला चतुर बाजार मानवीय रिश्तों को व्यापार बनाते चलता है. अफसोस ! यह अकेले आदमी के हिस्से में है. वही दुनिया में निर्णायक स्थिति में है. उनमें से भी कुछ सब-कुछ संचालित करने की ताकत रखते हैं. वे सत्ता-समीकरण तय करते हैं; मोहरे और वजीर रचते हैं; भव्य बाजार का मायाजाल बुनते हैं और दिव्यता के उन्माद के साथ छलते हैं; हथियार बनाते हैं/बेचते हैं, दवा के कारखाने लगाते हैं, बेचकर दुआएं भी पाते हैं.
वे समय भी तय करने लगे हैं यानी रेत हमारी मुट्ठी से फिसलकर उनकी हथेली में गिर रही है. वक्त ने हमारे पैरों के नीचे से जमीन खींच ली है और अंधकूप में बेतरह गिरते हुए दो हजार तीन बारह महीनों के तीन सौ पैंसठ दिन/रात में बँटकर यों गुजरा कि दो हजार चार ठोस पर शीशे की तरह साफ अस्तित्व के साथ हमारे बस ठीक सामने है.
नववर्ष कैसे मनेगा, कौन मनवाएगा और कौन मना पाएगा? की बहसों में न उलझते हुए भी यह पूछना जरूरी है कि क्यों हम एक ऐसी दुनिया के ‘यूटोपिया’ को अपने व्यक्तिगत कल्पना-संसार से अलग पाते हैं, जिसमें सब सुखी और खूबसूरत हों? क्यों हमारे रिश्तों में वह दोस्त/साथी/पड़ोसी  उतने ही मजबूत बंध से बँधा नहीं होता? जितना हमारा ‘परिवार’. क्यों ‘मेरी साड़ी से उसकी साड़ी सफेद’ जैसे सस्ते विज्ञापन हमारी जिदगी का हिस्सा बनने लगते है? क्यों जीवन की धुरी सहअस्तित्व के बजाय स्वअस्तित्व के केंद्रक पर टिक गई है? क्या यह महसूस बिल्कुल नहीं होता कि अच्छी दुनिया के लिए सभी लोगों की बेहतरी के अलावा कोई उपाय नहीं है? स्वाभाविक है, यह सवाल तो उठेगा ही कि अच्छी दुनिया और सुखी लोगों से क्या मतलब है और कैसे यह हो सकता है? कल्पना की उड़ान  का विस्तार यथार्थ तक कैसे होगा? लेकिन, यह मुमकिन है. बस ! दूसरों के लिए भी उतनी ही जगह छोड़नी होगी, जितनी हमने अपने लिए तय की है; यह देखते हुए कि कोई बचा न रह जाए. सहस्राब्दि ने दिखाया है कि बाजार कल्पनाओं के रोमांच को सच की सीमाओं में बाँध लाता है. वह इच्छाशक्ति ही कुछ कर पाएगी. बस, उद्देश्य ‘साझा दुनिया-बेहतर दुनिया’ हो.
अतीत हो रहे साल के जख्म इतने हरे हैं कि कुरेदने की जरूरत नहीं. पलक झपकती है तो तस्वीर खिंच जाती है... कैमरे की स्मृति में ‘शटर’ गिरने-उठने की तरह. तेल के मार्फत अर्थव्यवस्था पर कब्जे की हवस में सिन्धुघाटी  सभ्यता के बराबर दुनिया की सबसे पुरानी मैसोपोटामिया की सभ्यता को अमेरिकी-ब्रितानी बमों से जमींदोज होते देखा है और उतने ही पुराने बाम को प्रकृति के कहर से. दो साहसी बहनों को चिकित्सा विज्ञान का ‘गिनी पिग’ होते देखा तो आम आदमी की भगवान हो चुकीं मदर टेरेसा को धर्म के ठेकेदारों के हाथों ‘धन्य’ होने का खेल भी; राजनीति-नौकरशाही-अपराध जगत के सबसे बड़े गठजोड़ ‘तेलगी कांड’ को देखा तो दलाली की राजनीति के जूदेव-जोगी सिद्धांत भी. मुंबई बमकांड की पुनरावृत्ति से थर्राए भी. कई राज्यों में सत्ता बदलते देखी, मुख्यमंत्रियों का बदलना और ‘फीलगुड फैक्टर’ का दर्शन भी. रुपया चढ़ते देखा और शेयर बाजार भी. बस नहीं देखा तो जन के लिए बने तंत्र को जनता के पक्ष में जाते हुए. वह मरती रही, बेकारी, भुखमरी, गरीबी, आपदा और मानवजनित अन्याय से. भूमंडलीकरण ने नया कल्पनालोक रचा. वहाँ से इत्र की सुगंध जैसा ‘फीलगुड’ फैक्टर निकला. नेता ‘फीलगुड फैक्टर’ को सूंघते रहे, आनंद के समुद्रों में डूबते उतराते रहे. टूटी-फूटी सडकों पर जानदार सस्पेंशनवाली शानदार गाड़ियों से चलते रहे, महंगे होटलों में स्वादिष्ट भोजन से छकते रहे, आलीशान मकानों में ऐशोआराम से भर जाते रहे,  छतफाड़ ठहाके लगाते रहे, अफसर जीहुजूरी में सब सुख भोगते रहे. जनता देखती रही. हकीकत में भी, फिल्मों भी. उसकी नियति ही ऐसी थी.
‘नियति’ में निराशा का जो गहन भाव है, वह दो हजार चार के आगम को जरा कष्टकर कर सकता है, पर वक्त का हरेक क्षण बेहतरी के बीज सहेजे होता है. लेकिन, बीज कैसे बोया जाए, अंकुर फूटें, बिरवा से वृक्ष हो जाए; यह सब होगा कैसे? करेगा कौन? राजनेता, नौकरशाही, उद्योगपति, यही व्यवस्था? अमेरिका में भी आम चुनाव हैं; बुश को लडना है. भारत में भी आम चुनाव हैं. अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी को लडना है. देश का आधा साल चुनाव में जाना है. छोटे नेता-कार्यकर्ता से लेकर बडे नेता-कार्यकर्ता तक सब व्यस्त रहेंगे. बुश के पास सद्दाम का ‘फंडा’ है, अटल के पास ‘फीलगुड फैक्टर’ का. नकारने के बावजूद दोनों दो ध्रुवों के नेता हैं और दोनों कई दलों के गठबंधन का नेतृत्व करेंगे. जीते जो, देश में आगे ‘साझा सत्ता’ की राजनीति चलेगी.
लेकिन, सत्ता में काबिज होने की इस राजनीति में दुनिया के लिए कोई जगह नहीं है. पिचानवें फीसदी लोगों के लिए भाग्यविधाता बन बैठे राजनीतिक जो चाहेंगे होगा. वे वही करेंगे, जो बहुराष्ट*ीय कंपनियां कहेंगी. ये कंपनियां वही कहेंगी, जो दुनिया का अधिकतम मुनाफा छानकर उनके पास पहुँचा दे. सहस्राब्दि के चौथे पडाव के अंत में भी यही लिखा जाएगा, जो अभी लिखा जा रहा है, अगर हमने कुछ न किया. सिर्फ युद्धभूमि बदलेगी, करेंसी और तकनीक बदलेगी.
नया साल इतिहास को किताबों में दफन कर देने का सुनहरा मौका हो सकता है. थोड़ी-सी कोशिश कीजिए; हाथ बढ़ाइए  और थाम लीजिए वक्त को.


लोकमत समाचार में मैंने ये सम्पादकीय २००३ की ३१ दिसंबर को लिखा था. पहले सोचा था कि पहली जनवरी २०११ को पोस्ट करूँगा, पर नहीं कर पाया. अब कर रहा हूँ, क्योंकि ये अब भी मौजूं है. 

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी