नागपुर में सामाजिक आन्दोलनों का यथार्थ
सुनील सोनी
मध्य भारत में तीन सौ सालों से नागपुर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल का केंद्र रहा है. गोंड राजाओं के शासनकाल में नागपुर को नियोजित करने और उसे सड़क मार्ग से आसपास के इलाकों से जोड़ने की समझ-बूझ को मध्यकाल के अंतिम चरण में ऐसी उपलब्धि कहा जा सकता है, जिस्सने संभावनाओं के द्वारों को खोला. संभवतः शेरशाह सूरी के बाद यह इस इलाके के ढांचागत परिवर्तन से जुडी ऐसी पहल थी, जिसने उत्तरोत्तर गति पकड़ी. नागपुर से गुजरने वाली ग्रेट नार्दन रोड और ग्रैंड ट्रंक रोड सूरी की देन थीं. संभवतः यही प्रेरणा रही होगी, जो अंग्रेजों ने (भले ही अपने फायदे के लिए) रेलमार्गों के लिए इस जगह को चुना. इस जगह के बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकासक्रम में बुनियादी ढांचे ने प्रमुख भूमिका निभाई. शायद यही कारण रहा होगा कि नागपुर में राजनीतिक आंदोलनों की एक लम्बी परंपरा रही है, जिसमें पिछली सदी के जंगल सत्याग्रह और झंडा सत्याग्रह के अलावा पृथक विदर्भ राज्य आन्दोलन और नक्सल आन्दोलन तक गिनाये जा सकते हैं. वामपंथी कम्युनिस्ट और दक्षिणपंथी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गढ़ अगर नागपुर रहा है तो इसकी वजह यहाँ का सामाजिक तानाबाना और सामाजिक-आर्थिक स्थितियां रही हैं. निश्चय ही एक कारण इसके तत्कालीन राजधानी होने में भी निहित है, जिसके कारण सन्देश सीधे सत्ता तक पहुँचाने में आसानी रही. इतनी अधिक राजनीतिक गतिविधियों के बावजूद यहाँ चेतना का विकास उस तरह देखने को नहीं मिलता, जो एकरस जड़ता को तोड़ने में बहुत कामयाब हो. एक अंदाजा लगाया जा सकता है कि मध्य भारत में सामंती संरचना अब भी उतनी ही पुष्ट क्यों है, जितनी सौ-डेढ़ सौ साल पहले थी अथवा वास्तव में जिसे अपेक्षाकृत उदार समाज कहा जाता रहा है, क्या वह सचमुच में उदार था? ज़ाहिर है, तमाम आधुनिक समाजशास्त्रीय दर्शन इस तत्व को नकार देंगे. कोई शक नहीं कि मध्य भारत के सामाजिक ढांचे में बदलाव के कुछ गंभीर प्रयास नागपुर क्षेत्र में हुए. लेकिन वे अपर्याप्त रहे, क्योंकि उनको जिस तरह का प्रत्युत्तर मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया. पलट कर देखें तो नागपुर में न केवल प्रगतिवादी संत आन्दोलन भी दिखता है, बल्कि शैक्षणिक प्रवाह भी नज़र आता है. यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में कम उत्तेजना नहीं थी, पर वह बाह्य बल कमजोर दिखता है, जिससे महत्वपूर्ण बदलाव की उम्मीद बँधे. २०वीं सदी के शुरूआती तीन दशकों में कुछ ताकतें सक्रिय जरूर थीं और परिवर्तन गढ़ने में लगी थीं.
नागपुर को आंदोलित कर देने वाली सामाजिक हलचलों की चर्चा की जाये तो उसमें किसन फागुजी बंसोड़े (१८७०-१९४६) का नाम सबसे पहले लेना होगा. किसन फागुजी बंसोड़े को मूलतः एक मजदूर नेता की तरह देखा जाता है, जो उन्नीसवीं सदी के आखिर में दलित मिल मजदूरों को संगठित कर रहे थे, जिनकी संख्या कुल मिल मजदूरों में ४० प्रतिशत थी. लेकिन बंसोड़े वास्तव में एक चेतना एवं दूरदृष्टिसंपन्न विचारक और समाज सुधारक थे, जिन्हें आद्य पत्रकार और क्रन्तिकारी कवि के रूप में भी देखा जाना चाहिए. उन्होंने सबसे पहले मध्य भारत में सवर्णों को चुनौती दी और सत्ता तथा समाज में समानता के आधार पर भागीदारी की बात कही. वे लगातार भाषण देते रहे और लिखते रहे. पहले हस्तलिखित पत्रकों और बाद में कई अख़बारों में. इनमें से १९०२ से १९१८ के बीच चार अख़बार (मराठी दीनबंधु -१९०१-०२, निराश्रित हिंद नागरिक-१९१०, विटाल विध्वंसक -१९१३, मजूर पत्रिका- १९१८) उन्होंने खुद निकाले. उनके इस प्रयोग ने कट्टर हिन्दू समाज को झकझोर कर रख दिया और क्षेत्र के दलितों और अछूतों के बीच नए ढंग की सोच रखी. बंसोड़े नागपुर से कुछ दूर काटोल के मोहपा गाँव में पैदा हुए और संभवतः उन पर शिक्षा हासिल करने के दौरान ईसाई मिशनरी का काफी प्रभाव पड़ा. इसे उन्होंने सकारात्मक ढंग से इस्तेमाल किया. जाति उन्मूलन के लिए उन्होंने तत्कालीन संत चोखामेला, जो दलित होने की वजह से सवर्णों की बीच मान्य नहीं थे, के दलितों और अछूतों पर प्रभाव को समझा और जनजागरण की मुहिम में काम में लिया. यह कारगर तरीका था, जिससे पैदा चेतना ने इस इलाके में डा. आम्बेडकर को उनकी बुनियाद ज़माने में काफी मदद दी और इसी को आगे बढ़ते हुए उन्होंने धर्मं परिवर्तन के लिए नागपुर को चुना. यह देखना अचरज भरा होगा कि बंसोड़े, गाँधी के समकालीन हैं और दोनों के आन्दोलन तथा प्रचार के तरीके मिलते-जुलते हैं. लेकिन बंसोड़े कभी इंग्लैंड या दक्षिण अफ्रीका नहीं गए, जबकि गाँधी सीमोल्लंघन करके वहां गए और यूरोपीय क्रांतियों, संगठन-संस्थाओं, वैज्ञानिक समझ-बूझ तथा शासकों के दुर्व्यवहार से परिचित हुए. बंसोड़े को ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि वे खुद जाति प्रताड़ना सहते हुए बड़े हुए. लेकिन वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग और प्रतीकों के इस्तेमाल उन्होंने खुद सीखे और प्रयुक्त किये. बंसोड़े ने मिल मालिकों को तो झुका लिया और मजदूरों की अधिकतर मांगें पूरी हो गईं. लेकिन सवर्णों को सिर्फ झकझोर पाए. ये हुआ कि दलितों-अछूतों और सवर्णों के बीच इस मुद्दे पर जागृति पैदा हुई तथा उनमें से कुछ लोग इस दिशा में काम करने पर राजी हुए.
इसकी अगली कड़ी के तौर पर हमें जाईबाई चौधरी का नाम लेना होगा, जिन्होंने वह काम किया, जो उस वक्त अधिसंख्य सवर्णों ने भी स्वीकार नहीं किया था. महिलाओं की स्थिति दलितों के बीच अतिदलित की थी. जाईबाई ने इस स्थिति को बदलने के लिए छोटा-सा अभियान शुरू किया, जो बाद में महान मुहिम में बदल गया. जाईबाई के माता-पिता १८९६ में मजदूरी करने नागपुर आ गए थे और मिशनरी स्कूल में प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही ८-९ साल की आयु में ही (१९०१) उनकी शादी बापूजी चौधरी से कर दी. घर चलने के लिए उन्हें मजदूरी करनी पड़ी और वे नागपुर से कामठी तक की १० किमी दूरी सिर पर बोझ लेकर आती-जाती थीं. उसी वक्त मिशनरी मिस ग्रेगरी ने उनकी प्रतिभा और पीड़ा को पहचान लिया. उनके प्रयासों से टिमकी के मिशन स्कूल में वे शिक्षक बन गईं, पर सवर्ण अभिभावकों ने उनका बहिष्कार कर दिया. उस रोज जाईबाई ने नौकरी छोड़ दी और दलित -अछूत लड़कियों के बीच शिक्षा का उजाला फैलाने लगीं. वे घर-घर जाकर लड़कियों को पढातीं और चंदा जमा करतीं. धुन की पक्की जाईबाई ने १९२२ में मंगलवारी की न्यू कालोनी में संत चोखामेला गर्ल्स स्कूल खोल लिया, जिसकी देखा-देखी कई कन्या शालाएं क्षेत्र में खुल गईं. यह संभवतः बंसोड़े का ही कमाल था कि उनका एक प्रतीक यहाँ इस्तेमाल हो रहा था और जो लहर उन्होंने उठाई थी, वह नए रूप में और बड़ी हो गई थी. १९३० में नागपुर में जब पहली महिला परिषद् हुई तो जाईबाई उसकी स्वागत समिति की सचिव बनीं. आजादी मिलने तक अच्छी खासी संख्या में दलित लड़कियां पढ़-लिख चुकी थीं और कुछ सफेदपोश नौकरियों में भी आ गई थीं और आत्मनिर्भर होने की दिशा में पैर रख रही थीं.
लेकिन बाबू हरदास और उनके रामटेक सत्याग्रह के उल्लेख के बिना यह क्रांति अध्याय अधूरा रह जायेगा. बाबू हरदास (१९०४-३४) ने बंसोडे और जाई बाई के काम को आगे बढ़ाया. १९२१ में उन्होंने दलितों में जागृति लाने के लिए एक अख़बार 'महाराठे' निकला और बीड़ी मजदूरों का शोषण रोकने के लिए सहकारिता के आधार पर काम शुरू किया. महिलाओं की दशा सुधरने के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र खोला. १९२२ में उन्होंने महार समाज संगठन और एट्रोसिटी रोकने के लिए महार सेवक पथक बनाया. ये संगठन दलितों के बीच अनुशासन लाने का काम भी करता था. दलितों में एका लाने के लिए उन्होंने उपजाति कतमा करने के प्रयास किये. १९२३ में उन्होंने गवर्नर से असेम्बली और नगरीय निकायों में दलितों का प्रतिनिधि नामित करने की मांग की. समुदाय में शिक्षा का प्रसार करने के लिए उन्होंने कई नाइट स्कूल खोले और अंधविश्वास ख़त्म करने के लिए 'मंडई महात्म्य' नाम की पुस्तक लिखी, जिसका काफी असर हुआ. उन्होंने १९२७ में किसान फागुजी बंसोडे की मौजूदगी में नागपुर के पास स्थित रामटेक में दलित समुदाय से आह्वान किया कि वे रामटेक के मंदिर में पूजा न करें और न ही गंदे अम्बाडा तालाब में नहायें. साथ ही नासिक में मंदिर प्रवेश आन्दोलन में भाग लेने के लिए एक दल भेजा. १९३० में नागपुर में दलित परिषद के आयोजन में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई, जिसमें डा. आंबेडकर की मौजूदगी में दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की गई. यहीं ऑल इंडिया डिप्रेस क्लास फेडरेशन का गठन हुआ और वे सह सचिव चुने गए. १९३२ में उन्होंने मध्यप्रदेश बीडी मजदूर संघ की स्थापना की. १९३७ में वे नागपुर-कामठी से असेम्बली सदस्य चुने गए. बाबू हरदास ने छोटे से जीवनकाल में दलित समुदाय का चेतना स्तर काफी ऊंचा उठा दिया.
तीसरे और चौथे दशक में बहुमुखी प्रतिभा के धनी विद्वान (तिलक ने उन्हें 'विद्वत रत्न' की उपाधि दी थी) एड. केशव लक्ष्मण दप्तरी ने वह महत्वपूर्ण काम कर दिखाया, जो तत्कालीन समाज में लगभग असंभव था. वकालत के आजीविका के साधन होने के बावजूद उन्होंने ऐसे मुक़दमे लड़ने से इंकार कर दिया, जो झूठे हों. सत्यनिष्ठा के प्रति उनका आग्रह तत्कालीन समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा संघर्ष था, जिसमें हर कदम पर कांटे थे. बाद में गाँधीजी के कहने पर उन्होंने वकालत छोड़ दी और होमियोपैथी प्रैक्टिस शुरू कर दी. विवेकपूर्ण बुद्धिसम्मत दृष्टि होने के कारण उन्होंने भगवान के अस्तित्व से इंकार कर दिया और धर्म को विषय बनाकर आधा दर्जन ग्रन्थ लिखे, जिनमें से एक धर्म रहस्य स्वरूप भी था. धर्म की आड़ में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा पोंगापंथी की पोल खोलने उनके इस कदम ने हिन्दू समाज को भारी झटका दिया. गणित के विद्वान होने की वजह से उन्होंने ज्योतिष पर 'पूरण कल्प लता' नामक ग्रन्थ भी लिखा. १९२२ से १९३६ तक उन्होंने समविचारी साथियों को इकट्ठा किया और अस्पृश्यता निवारण मुहिम चलाई. इससे हिन्दू समाज के ठेकेदारों में खलबली मच गई. उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया. लेकिन उनके इस कदम ने सवर्ण हिन्दू समाज में ये बहस छेड़ दी कि दलितों और अछूतों को मुख्यधारा में लाया जाना चाहिए.
१९२९ में अमरावती की चांदूर तहसील के मंगरूल दस्तगीर गाँव से एक मुहिम चली, जिसे स्थानीय आबादी में संत का दर्जा पा चुके गणपति हरि महाराज ने उनकी मलिकी वाले विट्टल मंदिर के द्वार अछूतों के लिए खोल दिए. उन्होंने इसके लिए कोलकाता से अछूतों के प्रमुख नेता विराट चन्द्र मंडल को बुलाया. उसके बाद सैकड़ों सवर्णों और अछूतों ने एकसाथ महागू मातंग के घर भोजन किया. उन्होंने यह बाकायदा वरहाड़-मध्यप्रांत बहिष्कृत-सवर्ण परिषद का गठन करने के बाद एक प्रस्ताव पारित करके किया. उन्होंने सरकार को ज्ञापन भिजवाकर गोलमेज परिषद से लेकर हर स्तर पर अछूतों की नियुक्ति और शिक्षा-हॉस्टल की व्यवस्था करने की मांग की. उन्होंने कुछ सूत्र दिए, जिनमें जाति छोड़कर अजात होना प्रमुख था. इसके अलावा सर्वधर्म सद्भाव, स्त्री स्वातंत्र्य, स्त्री शिक्षण, चमत्कार निषेध, पिंडदान-श्राद्ध खंडन, बाल विवाह निषेध, विधवा विवाह करने, सदा विवाह करने और दहेज़ न लेने जैसे क्रन्तिकारी विचार रखे. सैकड़ों लोग जाति छोड़कर अजात बने और इसकी आंच नागपुर तक पहुंची. लेकिन संत के देहांत के बाद यह आन्दोलन इलाके तक ही सिमटकर रह गया.
इस बात का उल्लेख किये बिना नहीं रहा जा सकता कि नागपुर समेत पूरे विदर्भ की अर्थव्यवस्था अधिकतर समय गैरमराठी साहूकारों के हाथ में रही. नागपुर के भोंसलों की राजधानी होने की वजह से यहाँ घटाटे, चिटनवीस, बूटी जैसे साहूकार और जमींदार थे. लेकिन जब अमेरिका में गृहयुद्ध की वजह से लैटिन अमेरिका से ग्रेट ब्रिटेन को कपास नहीं मिल पाया तो वहां की कपडा मिलें बंद होने लगीं. विकल्प के तौर पर अंग्रेजों का ध्यान विदर्भ के कपास की ओर गया. उन्होंने तेजी बरतते हुए नागपुर-बॉम्बे रेल लाइन तैयार कर ली. बॉम्बे को १८६४ में अकोला और १८६६ में नागपुर से जोड़ दिया गया. कपास ढोई जाने लगी, ताकि इंग्लैंड ले जाया जा सके. अंगेजों ने ज्यादा दाम देकर कपास खरीदी तो कपास का रकबा बढ़ गया. इस बीच ढुलाई में तेजी लाने के लिए अंग्रेजों ने रेल लाइन दोहरी कर दी. अर्थव्यवस्था में तेजी से परिवर्तन आया. किसानों की आमदनी बढ़ी और उद्योग-धंधे भी बढ़ने लगे. चूंकि स्थानीय मराठी मानुष का ध्यान इस बदलाव की ओर नहीं था, इसलिए गुजराती और मारवाड़ी समुदाय ने इसका फायदा उठाया. उन्होंने धंधे और कारखानों में पैसा लगाया. वे ही साहूकारी भी करने लगे. पैसा बढ़ा तो डॉक्टर-वकील भी दूसरे प्रान्तों से आने लगे. नागपुर तो वैसे भी कॉस्मोपोलिटन समाज था. अर्थव्यवस्था परप्रांतीयों के हाथ में आने से उनका राजनीतिक दखल भी काफी रहा और उसने ब्राह्मण नेतृत्व की मदद की. चूंकि ब्रह्मनेतर नेता भी उनके साथ थे, तो एक-दो दफे छोड़कर पश्चिम महाराष्ट्र की तरह यहाँ ब्रह्मनेतर आन्दोलन का असर नहीं दिखता. संत गुलाब महाराज, संत गाडगे महाराज और संत तुकडोजी महाराज ने भी परंपरा और कर्मकांड के विरोध में जनजागृति की, पर सभी को सामंजस्य के साथ चलने की सलाह दी.
यह वही समय था, जब नागपुर में और कुछ क्रांतिकारी घटनाएं घट रही थीं, जिन्होंने इतिहास का रुख मोड़ दिया. पूरे मध्य प्रान्त में उस समय जचकी के लिए कोई ऐसा अस्पताल नहीं था, जहाँ भेदभाव न होता हो. बाल विवाह खूब होते थे और मृत्यु दर काफी अधिक थीं. विधवा विवाह नहीं होते थे और उन्हें काफी कड़े नियम-कानूनों के बंधन में बड़ी ख़राब स्थितियों में रहना पड़ता था. कमलाबाई होस्पेट भी किशोरावस्था में ही विधवा हो गईं. लेकिन मुंडन से पहले ही उनके भाई दत्तात्रय कृष्ण मोहनी उन्हें विरोध के बावजूद मायके ले आये और लेडी डफरिन अस्पताल में प्रसूति विशेषज्ञ के पाठ्यक्रम में प्रवेश दिलवा दिया. इसका भी काफी विरोध हुआ, क्योंकि ब्राहमणों में ऐसे काम का निषेध था, जिसमें खून बहता हो. अस्पतालों में सिर्फ मिशनरी ये काम किया करते, जबकि देशज ज्ञान के सहारे दाई घर में ही प्रसव करवाती थी. उनके बाद दो और ब्राह्मण विधवाओं ने पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया. पहली सावित्रीबाई मटंगे (ऑल इंडिया रिपोर्टर के संस्थापक वामन वासुदेव चितले की बहन) और दूसरी वेनुबाई नेने (वे पटवर्धन स्कूल में शिक्षक, एक लेखक और विदर्भ साहित्य संघ के पदाधिकारी की बहन थीं). कमलाबाई ने बाद में वहां काम करते हुए जब मिशनरियों के भेदभाव को देखा और अपमान सहा, तो उन्होंने अपनी दोनों साथियों के साथ मिलकर एक प्रसूति गृह की स्थापना का संकल्प किया, जिसमें किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं किया जाये. १९२१ में छोटे से प्रसूति केंद्र मातृ सेवा संघ की स्थापना हुई और फिर वह मध्य प्रान्त का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा शाखाओं वाला स्त्री चिकित्सालय बन गया. अब भी उसकी विदर्भ, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ मिलकर ९ शाखाएं हैं. कमलाबाई के हौसले ने न केवल मातृ-शिशु मृत्युदर में कमी ला दी, बल्कि हिन्दू महिलाओं को ऐसे बंधन से आजाद करवाया, जो सपना ही था. नागपुर के सेन्ट्रल म्यूजियम में कमलाबाई की तस्वीर इसका प्रमाण है.इसी मोहनी परिवार की एक लड़की दमयंती थेरगाँवकर तलाक़ के बाद समुद्रोल्लंघन करके न सिर्फ इंग्लैंड गईं, बल्कि वहां दूसरी शादी भी की. उनके भाई परशुराम थेरगाँवकर ने बावजूद एक विधवा से विवाह करके हिन्दू समाज को सकते में दल दिया. बाद में ये काम मिसाल बन गए. सारे ज़माने के विरोध के बीच घर की दहलीज़ लांघकर अनसूया वाडेगाँवकर ने वह काम किया, जिसे मध्य प्रान्त की रंगभूमि हमेशा याद रखेगी. उन्होंने रंगकर्म में तब भागीदारी की, जब कोमलांग पुरुष स्त्री वेश धरकर नारी किरदार निभाया करते थे. यही क्रान्तिधारा रंगभूमि में अब तक प्रवाहित हो रही है.
एक घटना का जिक्र जरूरी है, जो नागपुर के शैक्षणिक इतिहास का अहम फैसला है. स्वतंत्रता आन्दोलन के वक्त हैदराबाद में उन दिनों निजाम के खिलाफ 'वन्दे मातरम' आन्दोलन चल रहा था, जिसमें अधिसंख्य कालेज छात्र शामिल थे. स्वतंत्र भारत के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत पी. वी. नरसिंहराव भी उनमें शामिल थे. निजाम के कहने पर यूनिवर्सिटी ने सभी छात्रों को रेस्टीगेट कर दिया. परीक्षा करीब थी और उनका भविष्य ख़राब होने की आशंका थी. नागपुर के सिटी कालेज के प्राचार्य श्री पंढरीपांडे ने अंग्रेजों की नाराजगी की परवाह किये बिना उन छात्रों को प्रवेश दिया और उनके अनुरोध पर नागपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति दादा तुकाराम जयराम केदार ने उन्हें परीक्षा में बैठने का मौका दिया. इस घटना से नागपुर विश्वविद्यालय का सम्मान तथा रुतबा बढ़ गया.
नागपुर समेत पूरे मध्य प्रान्त में मुसलमानों की स्थिति भी बहुत खराब थी. सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक, तीनों क्षेत्रों में वे पिछड़े हुए थे. एड. मोहम्मद सईद हयात ने १९२९ में मुसलमानों, खास तौर पर मोमिन अंसारी बिरादरी के बीच शिक्षा का प्रसार करने के लिए 'मुट्ठी फंड' अभियान चलाया. इसमें हर मोमिन बुनकर ने कपड़े के हर धागे के हर छिद्र पर एक पैसा दिया. उस पैसे से हर मोमिन के पुत्रों की मैट्रिक तक शिक्षा की व्यवस्था की गई. उन्होंने मोमिनपुरा इस्लामिक हाईस्कूल की स्थापना की, जिसमें परंपरागत धार्मिक शिक्षा के बजाये अंग्रेजी पद्धति से शिक्षा दी जाती थी. इससे मुसलमानों में नाराज़गी फ़ैल गई, पर जब उद्देश्य समझाया गया तो वे मान गए. उन्होंने अंजुमन हामी इ इसलाम नाम की संस्था बनाई, जो उस समय हाई स्कूल तक था और अब पॉलीटेक्निक तक है. बाद में वे राजनीति में कूद गए और मध्य प्रान्त एवं बरहाड़ मुस्लिम लीग के प्रमुख बन गए. विभाजन तक वे जिन्ना के साथी रहे. बाद में उन्होंने महाविदर्भ आन्दोलन में हिस्सेदारी की. वे सूफी परम्परा के कायल और विद्वान थे. उनके ही कारण नागपुर में मुसलमानों में अपेक्षाकृत शिक्षा का स्तर ऊंचा है.
किसी भी अच्छे समाज की निशानी उस समूह में रहने वाले कमजोर और निःशक्त लोगों को समानता का मौका देना और उन्हें उसके लिए तमाम अवसर उपलब्ध करवाना होता है. नागपुर में सदी के पूर्वार्ध में ही नेत्रहीन एवं मूक-बधिर शालाएं स्थापित हो गई थीं. गांधीजी के सेवाग्राम आश्रम में १९२१ से ही कुष्ट रोगियों की देखभाल का काम करते-करते मनोहर दीवान ने इसे जीवन का लक्ष्य बना लिया और बाद में १९३७ में दत्तपुर में महारोगी सेवा मंडल की स्थापना की. उसके बाद बाबा आमटे का आनंदवन कुष्ठ रोगियों का सबसे बड़ा शरणस्थल बना. मातृसेवा संघ ने भी दो काम किये. पहला मतिमंद बच्चों के लिए स्कूल खोले और अनाथ बच्चों के लिए मेडिकल कालेज में एक केंद्र खोला. अनाथ बच्चों के सबसे बड़े पालनपोषण केंद्र के रूप में श्रद्धानंद अनाथालय का जिक्र किये बिना कोई भी उल्लेख अधूरा होगा. नागपुर हमेशा नशाबंदी आन्दोलन का प्रमुख केंद्र रहा है. डा. चोलकर, महात्मा भगवानदीन और उदाराम पहलवान के नेतृत्व में आन्दोलन ने विराट रूप ले लिया. लेकिन १ जनवरी १९२३ को निकाले गए जुलूस पर अंग्रेजों की गोलियां बरसीं और १० लोग मरे गए. गोलीबार चौक उसी की याद है. उस आन्दोलन की एक अन्तःधारा अब भी मौजूद है और नागपुर शहर समेत अलग-अलग जगह ऐसे आन्दोलन होते रहते हैं. कानूनी सहारे के बावजूद कुछ जगह ही सफल होते हैं, बाकी जगह मिलीभगत और साजिश की भेंट चढ़ जाते हैं.
नागपुर में सांस्कृतिक आन्दोलनों में सबसे प्रमुख ललित कला भारती का समानांतर समग्र कला आन्दोलन रहा. इसमें पथ नाटक, पथ काव्य, पथ पेंटिंग, पथ नृत्य समाहित था. श्रीपाद भालचंद्र जोशी के नेतृत्व में ये आन्दोलन परवान चढा और एक कालावधि के बाद नेपथ्य में चला गया. मराठी रंगमंच को नागपुर से ही नुक्कड़ नाटक आन्दोलन मिला, जो अब भी छिटपुट जारी है. जन साहित्य और दलित साहित्य आन्दोलन भी थोड़ी-बहुत हलचल मचाकर समय के साथ लुप्तप्राय हो गए.
आज़ादी के बाद नागपुर में कई परिवर्तन आये. नौ साल बाद ही वह महाराष्ट्र नामक नए राज्य का हिस्सा बन गया और राजधानी के बजाय दुय्यम शहर बनकर रह गया. इस दौरान वह विदर्भ राज्य समेत कई राजनीतिक आंदोलनों का गवाह बना. लेकिन सामाजिक आन्दोलन लगभग ठहर गए. सिर्फ नक्सलवादी आन्दोलन को छोड़ दिया जाये तो लगभग पॉँच दशक से हर जगह खामोशी है. बीच-बीच में कुछ पत्थर तालाब के शांत पानी में पड़ते हैं तो हलचल होती है, पर बहुत देर तक कायम नहीं रहती. इसके बावजूद कुछ जिन आन्दोलनों का जिक्र किया जा सकता है, उनमें अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की तीन दशकों की लगातार मुहिम है, जिसे वरिष्ठ पत्रकार-समाजकर्मी उमेश चौबे और हरीश देशमुख मिलकर चला रहे हैं. हालाँकि इसके बावजूद अब तक इस बुद्धिवादी आन्दोलन को जनाधार की तलाश है. हुंदा विरोध आघाडी ने एक ज़माने में अच्छा काम किया, पर अब उसका विसर्जन हो चुका है. धर्मनिरपेक्ष आन्दोलन भी शुरुआती चमक के बाद लापता है. मजदूर यूनियंस जरूर अलग-अलग टापुओं पर कुछ काम कर रही हैं, पर समग्रता में आसमान के तारे बन चुकी हैं.
यह कहा जा सकता है कि फिलहाल नागपुर समेत पूरे विदर्भ में (बल्कि समूचे देश में) जनांदोलनों के बजाय एनजीओ संस्कृति हावी है और उसका बदतर रूप यहाँ देखा जा सकता है. (बेशक, अँगुलियों में गिनने लायक कुछ एनजीओ बढ़िया काम भी कर रहे हैं). बिना किसी जन जवाबदेही के अधिकतर एनजीओ देसी-विदेशी फंड का इस्तेमाल ऐसे अनुत्पादक कामों में कर रहे हैं, जिनकी समाज को भनक तक नहीं लगती. पॉश होटलों-रिसोर्टों में बैठकें-संगोष्ठियाँ, लिमोजिन से जरा-सी कम गाड़ियां, देश-विदेश की लगातार यात्राएं और लक्जरी खरीद-ओ-फरोख्त, शानदार प्रेस ब्रीफिंग एवं मीडिया कम्युनिकेशन, कारपोरेट कल्चर और बिना किसी गलती के बिल और अकाउंट उनकी खासियत हैं. सिर्फ उनका काम जनता और जनता के वास्तविक मुद्दों को खारिज करना है.
इसके बावजूद राहत यही है कि कहीं-कहीं अच्छा काम भी हो रहा है, जिसके दीर्घकालिक परिणामों की उम्मीद की जा सकती है. इनमें सबसे अच्छा काम राम इंगोले कर रहे हैं. वे नागपुर की वारांगना बस्ती गंगा-जमुना की सेक्स वर्कर्स (जानबूझकर वेश्याओं नहीं लिख रहा, क्योंकि उससे सडांध भरे दिमाग की घिनौनी तस्वीर बनती है) के बच्चों को अलग रखकर पढ़ाते-लिखाते हैं. खासकर लड़कियों को. नौकरी करते हैं. कुछ पैसा खुद लगते हैं. कुछ उधर लेते हैं और कुछ चंदा या दान मिल जाये, तो भी ले लेते हैं. भीषण किस्म की कठिनाइयाँ सहते हैं, घबराते भी हैं, पर काम कभी छोड़ते नहीं.
सीमा साखरे भी उनकी सीमाओं के बावजूद बेहतरीन काम कर रही हैं. वे पीड़ित महिलाओं की हर किस्म से सहायता करती हैं और शरण देती हैं. उनका वास्तविक पुनर्वास भी करवाती हैं. अधिकांश चुपचाप और कुछ चिल्लाकर वे लगातार काम में जुटी हुई हैं.
सावनेर के पास टाकली गाँव में बरसों से खामोशी से पुष्प बेन देसाई भंसाली सेवाश्रम के नाम से स्कूल चला रही हैं. गांधीवादी हैं और स्कूल भी वैसे ही चलती हैं. शिक्षा पर जो काम उन्होंने किया है, उससे बड़ी उम्मीद बंधती है.
शिक्षा के क्षेत्र में वर्धा के गाँव में सुमन ताई बंग 'चेतना विकास' नाम से एक कार्यक्रम चला रही हैं. वे अपनी पुत्रवधू पद्मजा के साथ गाँव-गाँव जाकर अनौपचारिक शिक्षा का अलख जगा रही हैं. कई सालों से जारी काम के कुछ अच्छे नतीजे आये हैं. वर्धा में ही सुषमा शर्मा 'नई तालीम' के मार्फ़त गांधीजी का सपना साकार करने में लगी हुई हैं. सुमन ताई और ठाकुरदास बंग के दूसरे पुत्र-पुत्रवधू अभय और रानी बंग भी 'सर्च' के बैनर तले स्वास्थय पर काम कर रहे हैं. गढ़चिरोली के हेमलकसा में बाबा आमटे के पुत्र-पुत्रवधू डा. प्रकाश और डा. मन्दाकिनी आदिवासियों से संवाद की लम्बी प्रक्रिया में जुटे हैं, जबकि डा. सतीश गोगुलवार और शुभदा देशमुख 'आम्ही आमच्या आरोग्य साठी' के बैनर तले नागपुर से गढ़चिरोली तक शहरी गरीबों से लेकर आदिवासी महिलाओं तक के स्वास्थ्य पर काम कर रहे हैं. मेलघाट में डा. रवि और स्मिता कोल्हे देशज ज्ञान और कुपोषण के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं. ये सब एनजीओ हैं, पर चोखा काम कर रहे हैं, जो वास्तव में फायदा पहुँचायेगा.
नागपुर में होने वाली कुछ और ऐसी हलचलों का जिक्र करना जरूरी है, जो वास्तव में क्रांति लहर साबित हो सकती थीं, पर कुछ सीमाओं और वजहों से ऐसा नहीं हो पाया. ऐसा ही एक आन्दोलन एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांध गोसीखुर्द बांध के चलते करीब सौ-सवा सौ गाँव के लोगों के विस्थापन के विरोध में था. भंडारा और नागपुर जिले में स्थित इस बांध से बहुत कम लोगों (संभवतः चंद्रपुर के ११ गाँव को सिंचाई सुविधा) को फायदा हो रहा था, जबकि इसके नुकसान बहुत थे. गोसीखुर्द प्रकल्पग्रस्त संघर्ष समिति के तत्वावधान में विलास भोंगाड़े ने लगातार विस्थापितों को संगठित किया और शुरुआती वर्षों में काफी प्रभावी ढंग से आन्दोलन चलाया. उनका मुख्य मुद्दा नर्मदा बचाओ आन्दोलन की तरह बांध का विरोध नहीं था. वे पुनर्वास ठीक से करने और बेहतर मुआवजा देने के लिए लड़ रहे थे. लेकिन नकदी मुआवजा बंटने तथा बांध पूरा होने में १५-१७ साल की देरी से विस्थापितों की रूचि कम हो गई, क्योंकि वे दोहरे लाभ में थे. वे काफी सालों तक अपनी ही जमीन जोत रहे थे तथा फसल उगा रहे थे. कार्यकर्ताओं तथा नेतृत्व में मतभेद के चलते बाद में आन्दोलन में फूट पड़ गई और उसकी ताकत कम हो गई. राजनेताओं और प्रशासन ने इसका फायदा उठाया. हकीकत ये भी है कि एनजीओ की दिलचस्पी बढ़ जाने और संघर्ष का स्पष्ट रोडमैप न होने की वजह से विस्थापितों में ये समझ बनी कि यह लडाई नकली है. नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने एक बहुआयामी लड़ाई लड़ी, जिसमें उन्होंने व्यवस्था को झुकाने के हर औजार का इस्तेमाल किया और संघर्षरत लोगों के जीवन में परिवर्तन लाने के लिए सकारात्मक कदम भी उठाए. यहाँ ऐसा नहीं हुआ. उसकी वजह वर्ग का अलग होना भी था. इन सीमाओं के बावजूद ये आन्दोलन मध्य भारत में एक मिसाल कायम कर पाटा, अगर वो अपनी प्राथमिक मांगों को भी पूरा करवा पाता. लेकिन अब भी बेहतर मुआवजा और बढ़िया पुनर्वास एक सपना है. आन्दोलन अब भी जारी है, पर धार कुंद हो गई है.
नागपुर में जल, जंगल, जमीन की लड़ाई को लेकर व्यापक पहल हुईं, पर वे हलचल पैदा नहीं कर पाईं. पूरे मध्य भारत में संसाधनों पर कब्जे की लड़ाई को लेकर नागपुर में हो रही गतिविधियाँ बड़ा परिवर्तन ला सकती थीं. लेकिन जब तक जंगलवासियों के हक़ में कानून बना, तब तक आग ठंडी हो गई, जबकि वह फैलने लगी थी. इसकी वजह नेतृत्व में असमंजस, दिशाभ्रम और लड़ाई की तैयारी न होना था.
'कसेल त्याची जमीन' जैसे कानून के बावजूद प्रशासनिक लालफीताशाही और हठधर्मिता के खिलाफ जबरन जोत (सरकारी जमीन पर भूमिहीनों का कब्जा और खेती) को नियमित करने को लेकर बड़ा आन्दोलन खडा हुआ. अलग-अलग वक्त में विदर्भ में कई लोगों ने ये आन्दोलन चलाया, पर वह निरंतरता के अभाव और नेतृत्व की विफलता के चलते कोई प्रभाव डालने अथवा बदलाव करने में सफल नहीं हो पाया.
सबसे महत्वपूर्ण पहल के रूप में जिसका उल्लेख किया जा सकता है, वो नागपुर से ७ किमी दूर वलनी नामक एक गाँव में एक मालगुजारी तालाब पर ग्रामसभा के कब्जे को लेकर चली लड़ाई थी. इस तालाब पर मालगुजार ने कब्जा कर लिया था और उसे सुखाकर खेत बनाकर बेच रहा था. एक पर्यावरणवादी योगेश अनेजा ने गाँव में अलख जगाई और कानूनी और भौतिक लड़ाई लड़ी. उनका साथ गाँव के ही केशव डम्भारे और उनके साथियों ने दिया. उन्होंने दो काम किये. एक तो ग्रामसभा की ताकत का इस्तेमाल किया और दूसरे डिगर मशीनों से तालाब खोदा और उसकी उपजाऊ मिट्टी आसपास के किसानों को बेची. इससे किसानों का समर्थन मिला और आन्दोलन के लिए पैसा भी. अब भी वह आन्दोलन चल रहा है. मालगुजार से कानूनी लड़ाई जारी है. लेकिन इस आन्दोलन से प्रेरणा लेकर दूर-दूर तक कई छोटे-मोटे प्रयोग हुए. ये सब जल संरचनाओं को बचने और सहेजने के संघर्ष थे.
नागपुर में विचार के स्तर पर प्रयोगधर्मी काम कम हुए हैं. उनमें एक 'आजचा सुधारक' नामक मराठी जर्नल का यहाँ से पुनर्प्रकाशन था. डेढ़ सदी पहले गोपाल गणेश आगरकर ने पुणे में इस पत्रिका के मार्फ़त जो मूलभूत समाज सुधारक आन्दोलन चलाया और विवेकवादी समाज की स्थापना की दिशा में पहल की, दो दशक पहले कुछ लोगों ने उसे नागपुर में पुनर्जीवित किया. उसमे अगुआ दिवाकर मोहनी और नंदा खरे जैसे कई विचारक थे. शतावधानी नंदा खरे 'आजचा सुधारक' के फिलहाल संपादक हैं और वे नागपुर से इस क्रांति विचार को आगे बढ़ा रहे हैं. इस पत्रिका से अगर मुठ्ठीभर लोग भी प्रेरित हुए होंगे और विवेकवाद की दिशा में कदम बढाए होंगे, तो समझा जाना चाहिए कि संपूर्ण मानव समुदाय को सभ्य ज्ञानवान समाज की नींव पड़ना शुरू हो गया है.
सिनेमा के क्षेत्र में इतना ही गंभीर और रचनात्मक कार्य गोरा गांगुली ने किया. उन्होंने नागपुर को सिने माध्यम की बहुआयामी हकीकत से रूबरू करवाया और यहाँ ऐसा सिने समाज पैदा किया, जो उसे मनोरंजन से इतर समग्रता में समझता था. इसके लिए वे कभी पॉपुलर और वाणिज्यिक रास्ते पर नहीं गए, पर व्यापक प्रभाव पैदा किया.
बहुत से आन्दोलन और जनसंघर्ष इस मौके पर याद किये जा सकते हैं, पर उन्होंने चेतनाकरी हलचल पैदा नहीं की, जिससे उनका उल्लेख खासतौर पर किया जा सके. कई लोग इससे असहमत हो सकते हैं और उन्हें वह अधिकार है.
कुल मिलकर नागपुर का विकास जैसे जैसे हुआ है, उसका सामाजिक-आर्थिक चरित्र बदला है. लेकिन वहां राजनीतिक चेतना सुप्त है. सामाजिक उद्वेलनकारी गतिविधियों का न तो यहाँ क्रमिक विकास दिखता है और न ही वे अंतर्धाराओं के रूप में नज़र आती हैं. अलग-अलग समय पर बिना किसी अन्तर्सूत्र के वे घटित होती रहती हैं और उनमें सभी वर्ग हिस्सेदारी नहीं करते. जो हलचल जिस सीमा में है, उसके बाहर के लोग पहले उसे ठिठककर जरूर देखते थे. अब न तो उतना शऊर बचा है, न उतनी बेचैनी. संभवतः माध्यम वर्ग का विस्तार और लम्बी आर्थिक छलांग ने सामाजिक-राजनीतिक उद्देश्यों को परास्त कर दिया है.
सुनील सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
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narayan narayan
जवाब देंहटाएंहिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें
जवाब देंहटाएंSwagat hai..pratham aalekh ke lihaz se zara bada hai!
जवाब देंहटाएंAbhyas poorn aalekh hai..!
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